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Rigveda Mandal 1 / Sukta 105 / Mantra 7

191 Sukta
19 Mantra
1/105/7
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा Chhanda- भुरिग्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अ॒हं सो अ॑स्मि॒ यः पु॒रा सु॒ते वदा॑मि॒ कानि॑ चित्। तं मा॑ व्यन्त्या॒ध्यो॒३॒॑ वृको॒ न तृ॒ष्णजं॑ मृ॒गं वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥

अ॒हम् । सः । अ॒स्मि॒ । यः । पु॒रा । सु॒ते । वदा॑मि । कानि॑ । चि॒त् । तम् । मा॒ । व्य॒न्ति॒ । आ॒ऽध्यः॑ । वृकः॑ । न । तृ॒ष्णऽज॑म् । मृ॒गम् । वि॒त्तम् । मे॒ । अ॒स्य । रो॒द॒सी॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
अहं सो अस्मि यः पुरा सुते वदामि कानि चित्। तं मा व्यन्त्याध्यो३ वृको न तृष्णजं मृगं वित्तं मे अस्य रोदसी ॥

अहम्। सः। अस्मि। यः। पुरा। सुते। वदामि। कानि। चित्। तम्। मा। व्यन्ति। आऽध्यः। वृकः। न। तृष्णऽजम्। मृगम्। वित्तम्। मे। अस्य। रोदसी इति ॥ १.१०५.७

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 21 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (अहम्) संसार का उत्पन्न करनेवाला (सुते) उत्पन्न हुए इस जगत् में (कानि) (चित्) किन्हीं व्यवहारों को (पुरा) सृष्टि के पूर्व वा विद्वान् मैं उत्पन्न हुए संसार में किन्हीं व्यवहारों को विद्या की उत्पत्ति से पहिले (वदामि) कहता हूँ (सः) वह मैं सेवन करने योग्य (अस्मि) हूँ (तम्) उस (मा) मुझको (आध्यः) अच्छी प्रकार चिन्तन करनेवाले आप लोग जैसे (वृकः) चोर वा व्याघ्र (तृष्णजम्) पियासे (मृगम्) हरिण को (न) वैसे (व्यन्ति) चाहो। और शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के तुल्य जानना चाहिये ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार है। सब मनुष्यों के प्रति ईश्वर उपदेश करता है कि हे मनुष्यो ! तुम लोग जैसे मैंने सृष्टि को रचके वेद द्वारा जैसे-जैसे उपदेश किये हैं उनको वैसे ही ग्रहण करो और उपासना करने योग्य मुझको छोड़के अन्य किसीकी उपासना कभी मत करो। जैसे कोई जीव मृग या रसिक चोर वा बघेरा हरिण को प्राप्त होने चाहता है वैसे ही सब दोषों को निर्मूल छोड़कर मेरी चाहना करो और ऐसे विद्वान् को भी चाहो ॥ ७ ॥
Subject
अब विद्वान् जन इनके उत्तर ऐसे देवें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।