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Rigveda Mandal 1 / Sukta 105 / Mantra 6

191 Sukta
19 Mantra
1/105/6
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
कद्व॑ ऋ॒तस्य॑ धर्ण॒सि कद्वरु॑णस्य॒ चक्ष॑णम्। कद॑र्य॒म्णो म॒हस्प॒थाति॑ क्रामेम दू॒ढ्यो॑ वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥

कत् । वः॒ । ऋ॒तस्य॑ । ध॒र्ण॒सि । कत् । वरु॑णस्य । चक्ष॑णम् । कत् । अ॒र्य॒म्णः । म॒हः । प॒था । अति॑ । क्रा॒मे॒म॒ । दुः॒ऽढ्यः॑ । वि॒त्तम् । मे॒ । अ॒स्य । रो॒द॒सी॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
कद्व ऋतस्य धर्णसि कद्वरुणस्य चक्षणम्। कदर्यम्णो महस्पथाति क्रामेम दूढ्यो वित्तं मे अस्य रोदसी ॥

कत्। वः। ऋतस्य। धर्णसि। कत्। वरुणस्य। चक्षणम्। कत्। अर्यम्णः। महः। पथा। अति। क्रामेम। दुःऽढ्यः। वित्तम्। मे। अस्य। रोदसी इति ॥ १.१०५.६

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 21 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वानो ! (वः) इन स्थूल पदार्थों के (ऋतस्य) सत्य कारण का (धर्णसि) धारण करनेवाला (कत्) कहाँ है (वरुणस्य) जल आदि कार्यरूप पदार्थों का (चक्षणम्) देखना (कत्) कहाँ है तथा (महः) महान् (अर्यम्णः) सूर्य्यलोक का जो (दूढ्यः) अति गम्भीर दुःख से ध्यान में आने योग्य व्यवहार है उसको (कत्) किस (पथा) मार्ग से हम (अति, क्रामेम) पार हों अर्थात् उस विद्या से परिपूर्ण हों। और शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के तुल्य जानना चाहिये ॥ ६ ॥
Essence
विद्या प्राप्ति की इच्छावाले पुरुषों को चाहिये कि विद्वानों के समीप जाकर कार्य्य और कारण की विद्या के मार्ग विषयक प्रश्नों को कर उनसे उत्तर पाकर क्रियाकुशलता से कामों को सिद्ध करके दुःख का नाश कर सुख पावें ॥ ६ ॥
Subject
फिर इनको परस्पर क्या-क्या पूछना और समाधान करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।