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Rigveda Mandal 1 / Sukta 105 / Mantra 4

191 Sukta
19 Mantra
1/105/4
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
य॒ज्ञं पृ॑च्छाम्यव॒मं स तद्दू॒तो वि वो॑चति। क्व॑ ऋ॒तं पू॒र्व्यं ग॒तं कस्तद्बि॑भर्ति॒ नूत॑नो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥

य॒ज्ञम् । पृ॒च्छा॒मि॒ । अ॒व॒मम् । सः । तत् । दू॒तः । वि । वो॒च॒ति॒ । क्व॑ । ऋ॒तम् । पू॒र्व्यम् । ग॒तम् । कः । तत् । बि॒भ॒र्ति॒ । नूत॑नः । वि॒त्तम् । मे॒ । अ॒स्य । रो॒द॒सी॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
यज्ञं पृच्छाम्यवमं स तद्दूतो वि वोचति। क्व ऋतं पूर्व्यं गतं कस्तद्बिभर्ति नूतनो वित्तं मे अस्य रोदसी ॥

यज्ञम्। पृच्छामि। अवमम्। सः। तत्। दूतः। वि। वोचति। क्व। ऋतम्। पूर्व्यम्। गतम्। कः। तत्। बिभर्ति। नूतनः। वित्तम्। मे। अस्य। रोदसी इति ॥ १.१०५.४

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 20 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! मैं आपके प्रति जिस (अवमम्) रक्षा आदि करनेवाले उत्तम वा निकृष्ट (यज्ञम्) समस्त विद्या से परिपूर्ण (पूर्व्यम्) पूर्वजों ने सिद्ध किया (ऋतम्) सत्यमार्ग वा उत्तम जल स्थान (क्व) कहाँ (गतम्) गया (कः) और कौन (नूतनः) नवीन जन (तत्) उसको (बिभर्त्ति) धारण करता है इसको (पृच्छामि) पूछता हूँ (सः) सो (दूतः) इधर-उधर से बात-चीत वा पदार्थों को जानते हुए आप (तत्) उस सब विषय को (विवोचति) विवेककर कहो। और अर्थ सब प्रथम के तुल्य जानना ॥ ४ ॥
Essence
विद्या को चाहते हुए ब्रह्मचारियों को चाहिये कि विद्वानों के समीप जाकर अनेक प्रकार के प्रश्नों को करके और उनसे उत्तर पाकर विद्या को बढ़ावें और हे पढ़ानेवाले विद्वानो ! तुम लोग अच्छा गमन जैसे हो वैसे आओ और हमसे इस संसार के पदार्थों की विद्या को सब प्रकार से जान औरों को पढ़ाकर सत्य और असत्य को यथार्थभाव से समझाओ ॥ ४ ॥
Subject
फिर पूँछने और समाधान देनेवालों को परस्पर कैसे वर्त्ताव रखकर विद्या की वृद्धि करनी चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।