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Rigveda Mandal 1 / Sukta 105 / Mantra 2

191 Sukta
19 Mantra
1/105/2
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अर्थ॒मिद्वा उ॑ अ॒र्थिन॒ आ जा॒या यु॑वते॒ पति॑म्। तु॒ञ्जाते॒ वृष्ण्यं॒ पय॑: परि॒दाय॒ रसं॑ दुहे वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥

अर्थ॑म् । इत् । वै । ऊँ॒ इति॑ । अ॒र्थिनः॑ । आ । जा॒या । यु॒व॒ते॒ । पति॑म् । तु॒ञ्जाते॒ इति॑ । वृष्ण्य॑म् । पयः॑ । प॒रि॒ऽदाय॑ । रस॑म् । दु॒हे॒ । वि॒त्तम् । मे॒ । अ॒स्य । रो॒द॒सी॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
अर्थमिद्वा उ अर्थिन आ जाया युवते पतिम्। तुञ्जाते वृष्ण्यं पय: परिदाय रसं दुहे वित्तं मे अस्य रोदसी ॥

अर्थम्। इत्। वै। ऊँ इति। अर्थिनः। आ। जाया। युवते। पतिम्। तुञ्जाते इति। वृष्ण्यम्। पयः। परिऽदाय। रसम्। दुहे। वित्तम्। मे। अस्य। रोदसी इति ॥ १.१०५.२

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 20 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जैसे (अर्थिनः) प्रशंसित प्रयोजनवाले जन (अर्थम्) जो प्राप्त होता है उसको (वै) ही (पतिम्) पति का (जाया) सम्बन्ध करनेवाली स्त्री के समान (आ, युवते) अच्छे प्रकार सम्बन्ध करते हैं (उ) या तो जैसे राजा-प्रजा जिस (वृष्ण्यम्) श्रेष्ठों में उत्तम (पयः) अन्न (इत्) और (रसम्) स्वादिष्ठ ओषधियों से निकाले रस को (परिदाय) सब ओर से देके दुःखों को (तुञ्जाते) दूर करते है वैसे उस-उस को मैं भी (दुहे) बढ़ाऊँ। शेष अर्थ प्रथम मन्त्र में कहे के समान जानना चाहिये ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे स्त्री अपनी इच्छा के अनुकूल पति को वा पति अपनी इच्छा के अनुकूल स्त्री को पाकर परस्पर आनन्दित करते हैं वैसे प्रयोजन सिद्ध कराने में तत्पर बिजुली, पृथिवी और सूर्य प्रकाश की विद्या के ग्रहण से पदार्थों को प्राप्त होकर सदा सुख देती है, इसकी विद्या को जाननेवालों के सङ्ग के विना यह विद्या होने को कठिन है और दुःख का भी विनाश अच्छी प्रकार नहीं होता, इससे सबको चाहिये कि इस विद्या को यत्न से लेवें ॥ २ ॥
Subject
फिर वे राजा और प्रजा कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।