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Rigveda Mandal 1 / Sukta 105 / Mantra 17

191 Sukta
19 Mantra
1/105/17
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
त्रि॒तः कूपेऽव॑हितो दे॒वान्ह॑वत ऊ॒तये॑। तच्छु॑श्राव॒ बृह॒स्पति॑: कृ॒ण्वन्नं॑हूर॒णादु॒रु वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥

त्रि॒तः । कूपे॑ । अव॑ऽहितः । दे॒वान् । ह॒व॒ते॒ । ऊ॒तये॑ । तत् । शु॒श्रा॒व॒ । बृह॒स्पतिः॑ । कृ॒ण्वन् । अं॒हू॒र॒णात् । उ॒रु । वि॒त्तम् । मे॒ । अ॒स्य । रो॒द॒सी॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
त्रितः कूपेऽवहितो देवान्हवत ऊतये। तच्छुश्राव बृहस्पति: कृण्वन्नंहूरणादुरु वित्तं मे अस्य रोदसी ॥

त्रितः। कूपे। अवऽहितः। देवान्। हवते। ऊतये। तत्। शुश्राव। बृहस्पतिः। कृण्वन्। अंहूरणात्। उरु। वित्तम्। मे। अस्य। रोदसी इति ॥ १.१०५.१७

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 23 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (उरु) बहुत (तत्) उस विद्या के पाठ को (शुश्राव) सुनता है वह विज्ञान को (कृण्वन्) प्रकट करता हुआ (त्रितः) विद्या, शिक्षा और ब्रह्मचर्य्य इन तीन विषयों का विस्तार करने अर्थात् इनको बढ़ाने (कूपे) कूआ के आकार अपने हृदय में (अवहितः) स्थिरता रखने और (बृहस्पतिः) बड़ी वेदवाणी का पालनेहारा (अंहूरणात्) जिस व्यवहार में अधर्म है उससे अलग होकर (ऊतये) रक्षा, आनन्द, कान्ति, प्रेम, तृप्ति आदि अनेकों सुखों के लिये (देवान्) दिव्य गुणयुक्त विद्वानों वा दिव्य गुणों को (हवते) ग्रहण करता है। और शेष मन्त्रार्थ प्रथम के तुल्य जानना चाहिये ॥ १७ ॥
Essence
जो मनुष्य वा देहधारी जीव अर्थात् स्त्री आदि भी अपनी बुद्धि से प्रयत्न के साथ पण्डितों की उत्तेजना से समस्त विद्याओं को सुन, मान, विचार और प्रकट कर खोटे गुण स्वभाव वा खोटे कामों को छोड़कर विद्वान् होता है, वह आत्मा और शरीर की रक्षा आदि को पाकर बहुत सुख पाता है ॥ १७ ॥
Subject
फिर वह कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।