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Rigveda Mandal 1 / Sukta 105 / Mantra 16

191 Sukta
19 Mantra
1/105/16
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒सौ यः पन्था॑ आदि॒त्यो दि॒वि प्र॒वाच्यं॑ कृ॒तः। न स दे॑वा अति॒क्रमे॒ तं म॑र्तासो॒ न प॑श्यथ वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥

अ॒सौ । यः । पन्थाः॑ । आ॒दि॒त्यः । दि॒वि । प्र॒ऽवाच्य॑म् । कृ॒तः । न । सः । दे॒वाः॒ । अ॒ति॒ऽक्रमे॑ । तम् । म॒र्ता॒सः॒ । न । प॒श्य॒थ॒ । वि॒त्तम् । मे॒ । अ॒स्य । रो॒द॒सी॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
असौ यः पन्था आदित्यो दिवि प्रवाच्यं कृतः। न स देवा अतिक्रमे तं मर्तासो न पश्यथ वित्तं मे अस्य रोदसी ॥

असौ। यः। पन्थाः। आदित्यः। दिवि। प्रऽवाच्यम्। कृतः। न। सः। देवाः। अतिऽक्रमे। तम्। मर्तासः। न। पश्यथ। वित्तम्। मे। अस्य। रोदसी इति ॥ १.१०५.१६

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 23 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (देवाः) विद्वान् लोगो ! (असौ) यह (आदित्यः) अविनाशी सूर्य्य के तुल्य प्रकाश करनेवाला (यः) जो (पन्थाः) वेद से प्रतिपादित मार्ग (दिवि) समस्त विद्या के प्रकाश में (प्रवाच्यम्) अच्छे प्रकार से कहने योग्य जैसे हो वैसे (कृतः) ईश्वर ने स्थापित किया (सः) वह तुम लोगों को (अतिक्रमे) उल्लङ्घन करने योग्य (न) नहीं है। हे (मर्त्तासः) केवल मरने-जीनेवाले विचाररहित मनुष्यो ! (तम्) उस पूर्वोक्त मार्ग को तुम (न) नहीं (पश्यथ) देखते हो। शेष मन्त्रार्थ पूर्व के तुल्य जानना चाहिये ॥ १६ ॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि जो वेदोक्त मार्ग है, वही सत्य है, ऐसा जान और समस्त सत्यविद्याओं को प्राप्त होकर सदा आनन्दित हों, सो यह वेदोक्त मार्ग विद्वानों को कभी खण्डन करने योग्य नहीं, और यह मार्ग विद्या के विना विशेष जाना भी नहीं जाता ॥ १६ ॥
Subject
अब यह मार्ग कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।