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Rigveda Mandal 1 / Sukta 105 / Mantra 15

191 Sukta
19 Mantra
1/105/15
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ब्रह्मा॑ कृणोति॒ वरु॑णो गातु॒विदं॒ तमी॑महे। व्यू॑र्णोति हृ॒दा म॒तिं नव्यो॑ जायतामृ॒तं वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥

ब्रह्मा॑ । कृ॒णो॒ति॒ । वरु॑णः । गा॒तु॒ऽविद॑म् । तम् । ई॒म॒हे॒ । वि । ऊ॒र्णो॒ति॒ । हृ॒दा । म॒तिम् । नव्यः॑ । जा॒य॒ता॒म् । ऋ॒तम् । वि॒त्तम् । मे॒ । अ॒स्य । रो॒द॒सी॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
ब्रह्मा कृणोति वरुणो गातुविदं तमीमहे। व्यूर्णोति हृदा मतिं नव्यो जायतामृतं वित्तं मे अस्य रोदसी ॥

ब्रह्मा। कृणोति। वरुणः। गातुऽविदम्। तम्। ईमहे। वि। ऊर्णोति। हृदा। मतिम्। नव्यः। जायताम्। ऋतम्। वित्तम्। मे। अस्य। रोदसी इति ॥ १.१०५.१५

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 22 Mantra » 5

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Meaning
हम लोग जो (ऋतम्) सत्यस्वरूप (ब्रह्म) परमेश्वर वा (वरुणः) सबसे उत्तम विद्वान् (गातुविदम्) वेदवाणी के जाननेवाले को (कृणोति) करता है (तम्) उसको (ईमहे) याचते अर्थात् उससे माँगते हैं कि उसकी कृपा से जो (नव्यः) नवीन विद्वान् (हृदा) हृदय से (मतिम्) विशेष ज्ञान को (व्यूर्णोति) उत्पन्न करता है अर्थात् उत्तम-उत्तम रीतियों को विचारता है वह हम लोगों के बीच (जायताम्) उत्पन्न हो। शेष अर्थ प्रथम मन्त्र के तुल्य जानना चाहिये ॥ १५ ॥
Essence
किसी मनुष्य पर पिछले पुण्य इकट्ठे होने और विशेष शुद्ध क्रियमाण कर्म करने के विना परमेश्वर की दया नहीं होती और उक्त व्यवहार के विना कोई पूरी विद्या नहीं पा सकता, इससे सब मनुष्यों को परमात्मा की ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये कि हम लोगों में परिपूर्ण विद्यावान् अच्छे-अच्छे गुण, कर्म, स्वभावयुक्त मनुष्य सदा हों। ऐसी प्रार्थना को नित्य प्राप्त हुआ परमात्मा सर्वव्यापकता से उनके आत्मा का प्रकाश करता है, यह निश्चय है ॥ १५ ॥
Subject
फिर कैसे इसको पावे, यह उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

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