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Rigveda Mandal 1 / Sukta 105 / Mantra 14

191 Sukta
19 Mantra
1/105/14
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स॒त्तो होता॑ मनु॒ष्वदा दे॒वाँ अच्छा॑ वि॒दुष्ट॑रः। अ॒ग्निर्ह॒व्या सु॑षूदति दे॒वो दे॒वेषु॒ मेधि॑रो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥

स॒त्तः । होता॑ । म॒नु॒ष्वत् । आ । दे॒वान् । अच्छ॑ । वि॒दुःऽत॑रः । अ॒ग्निः । ह॒व्या । सु॒सू॒द॒ति॒ । दे॒वः । दे॒वेषु॑ । मेधि॑रः । वि॒त्तम् । मे॒ । अ॒स्य । रो॒द॒सी॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
सत्तो होता मनुष्वदा देवाँ अच्छा विदुष्टरः। अग्निर्हव्या सुषूदति देवो देवेषु मेधिरो वित्तं मे अस्य रोदसी ॥

सत्तः। होता। मनुष्वत्। आ। देवान्। अच्छ। विदुःऽतरः। अग्निः। हव्या। सुसूदति। देवः। देवेषु। मेधिरः। वित्तम्। मे। अस्य। रोदसी इति ॥ १.१०५.१४

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 22 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (सत्तः) विज्ञानवान् दुःख हरनेवाला (देवान्) विद्वान् वा दिव्य-दिव्य क्रियायोगों का (होता) ग्रहरण करनेवाला (विदुष्टरः) अत्यन्त ज्ञानी (अग्निः) श्रेष्ठ विद्या का जानने वा समझानेवाला (मेधिरः) बुद्धिमान् (देवेषु) विद्वानों में (देवः) प्रशंसनीय विद्वान् मनुष्य (मनुष्वत्) जैसे उत्तम मनुष्य श्रेष्ठ कर्मों का अनुष्ठान कर पापों को छोड़ सुखी होते हैं, वैसे (हव्या) देने-लेने योग्य पदार्थों को (अच्छ, आ, सुषूदति) अच्छी रीति से अत्यन्त देता है, उस उत्तम विद्वान् से विद्या और शिक्षा को ग्रहण करना चाहिये ॥ १४ ॥
Essence
ऐसा भाग्यहीन कौन जन होवे, जो विद्वानों से विद्या और शिक्षा न लेके इनका विरोधी हो ॥ १४ ॥
Subject
फिर वह विद्वान् वहाँ क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

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