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Rigveda Mandal 1 / Sukta 105 / Mantra 12

191 Sukta
19 Mantra
1/105/12
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
नव्यं॒ तदु॒क्थ्यं॑ हि॒तं देवा॑सः सुप्रवाच॒नम्। ऋ॒तम॑र्षन्ति॒ सिन्ध॑वः स॒त्यं ता॑तान॒ सूर्यो॑ वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥

नव्य॑म् । तत् । उ॒क्थ्य॑म् । हि॒तम् । देवा॑सः । सु॒ऽप्र॒वा॒च॒नम् । ऋ॒तम् । अ॒र्ष॒न्ति॒ सिन्ध॑वः । स॒त्यम् । त॒ता॒न॒ । सूर्यः॑ । वि॒त्तम् । मे॒ । अ॒स्य । रो॒द॒सी॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
नव्यं तदुक्थ्यं हितं देवासः सुप्रवाचनम्। ऋतमर्षन्ति सिन्धवः सत्यं तातान सूर्यो वित्तं मे अस्य रोदसी ॥

नव्यम्। तत्। उक्थ्यम्। हितम्। देवासः। सुऽप्रवाचनम्। ऋतम्। अर्षन्ति सिन्धवः। सत्यम्। ततान। सूर्यः। वित्तम्। मे। अस्य। रोदसी इति ॥ १.१०५.१२

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 22 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (देवासः) विद्वानो ! आप जैसे (सिन्धवः) समुद्र (सत्यम्) जल की (अर्षन्ति) प्राप्ति करावें और (सूर्य्यः) सूर्य्यमण्डल (तातान) उसका विस्तार कराता अर्थात् वर्षा कराता है वैसे जो (ऋतम्) वेद, सृष्टिक्रम, प्रत्यक्षादि प्रमाण, विद्वानों के आचरण, अनुभव अर्थात् आप ही आप कोई बात मन से उत्पन्न होना और आत्मा की शुद्धता के अनुकूल (नव्यम्) उत्तम नवीन-नवीन व्यवहारों और (उक्थ्यम्) प्रशंसनीय वचनों में होनेवाला (हितम्) सबका प्रेमयुक्त पदार्थ (तत्) उसको (सुप्रवाचनम्) अच्छी प्रकार पढ़ाना, उपदेश करना जैसे बने वैसे प्राप्त कीजिये। शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के समान जानना चाहिये ॥ १२ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे समुद्रों के जल उड़कर ऊपर को चढ़ा हुआ सूर्य्य के ताप से फैलकर, बरस के, सब प्रजाजनों को सुख देता है, वैसे विद्वान् जनों को नित्य नवीन-नवीन विचार से गूढ़ विद्याओं को जान और प्रकाशित कर सबके हित का संपादन और सत्य धर्म्म के प्रचार से प्रजा को निरन्तर सुख देना चाहिये ॥ १२ ॥
Subject
फिर विद्वान् जन इनके प्रति क्या-क्या उपदेश करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।