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Rigveda Mandal 1 / Sukta 105 / Mantra 10

191 Sukta
19 Mantra
1/105/10
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒मी ये पञ्चो॒क्षणो॒ मध्ये॑ त॒स्थुर्म॒हो दि॒वः। दे॒व॒त्रा नु प्र॒वाच्यं॑ सध्रीची॒ना नि वा॑वृतुर्वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥

अ॒मी इति॑ । ये । पञ्च॑ । उ॒क्षणः॑ । मध्ये॑ । त॒स्थुः । म॒हः । दि॒वः । दे॒व॒ऽत्रा । नु । प्र॒ऽवाच्य॑म् । स॒ध्री॒ची॒नाः । नि । व॒वृ॒तुः॒ । वि॒त्तम् । मे॒ । अ॒स्य । रो॒द॒सी॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
अमी ये पञ्चोक्षणो मध्ये तस्थुर्महो दिवः। देवत्रा नु प्रवाच्यं सध्रीचीना नि वावृतुर्वित्तं मे अस्य रोदसी ॥

अमी इति। ये। पञ्च। उक्षणः। मध्ये। तस्थुः। महः। दिवः। देवऽत्रा। नु। प्रऽवाच्यम्। सध्रीचीनाः। नि। ववृतुः। वित्तम्। मे। अस्य। रोदसी इति ॥ १.१०५.१०

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 21 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे सभाध्यक्ष आदि सज्जनो ! तुमको जैसे (अमी) प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष (उक्षणः) जल सींचने वा सुख सींचनेहारे बड़े (पञ्च) अग्नि, पवन, बिजुली, मेघ और सूर्य्यमण्डल का प्रकाश (महः) अपार (दिवः) दिव्यगुण और पदार्थयुक्त आकाश के (मध्ये) बीच (तस्थुः) स्थिर है और जैसे (सध्रीचीनाः) एक साथ रहनेवाले गुण (देवत्रा) विद्वानों में (नि, वावृतुः) निरन्तर वर्त्तमान हैं, वैसे (ये) जो निरन्तर वर्त्तमान हैं उन प्रजा तथा राजाओं के संगियों के प्रति विद्या और न्याय प्रकाश की बात (नु) शीघ्र (प्रवाच्यम्) कहनी चाहिये। और शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के समान जानना चाहिये ॥ १० ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य आदि घटपटादि पदार्थों में संयुक्त होकर वृष्टि आदि के द्वारा अत्यन्त सुख को उत्पन्न करते हैं और समस्त पृथिवी आदि पदार्थों में आकर्षणशक्ति से वर्त्तमान हैं, वैसे ही सभाध्यक्ष आदि महात्मा जनों के गुणों वा बड़े-बड़े उत्तम गुणों से युक्त मनुष्यों को सिद्ध करके इनसे न्याय और प्रीति के साथ वर्त्तकर निरन्तर सुखी करें ॥ १० ॥
Subject
फिर ये परस्पर कैसे वर्त्तें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।