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Rigveda Mandal 1 / Sukta 104 / Mantra 9

191 Sukta
9 Mantra
1/104/9
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒र्वाङेहि॒ सोम॑कामं त्वाहुर॒यं सु॒तस्तस्य॑ पिबा॒ मदा॑य। उ॒रु॒व्यचा॑ ज॒ठर॒ आ वृ॑षस्व पि॒तेव॑ नः शृणुहि हू॒यमा॑नः ॥

अ॒र्वाङ् । आ । इ॒हि॒ । सोम॑ऽकामम् । त्वा॒ । आ॒हुः॒ । अ॒यम् । सु॒तः । तस्य॑ । पि॒ब॒ । मदा॑य । उ॒रु॒ऽव्यचाः॑ । ज॒ठरे॑ । आ । वृ॒ष॒स्व॒ । पि॒ताऽइ॑व । नः॒ । शृ॒णु॒हि॒ । हू॒यमा॑नः ॥

Mantra without Swara
अर्वाङेहि सोमकामं त्वाहुरयं सुतस्तस्य पिबा मदाय। उरुव्यचा जठर आ वृषस्व पितेव नः शृणुहि हूयमानः ॥

अर्वाङ्। आ। इहि। सोमऽकामम्। त्वा। आहुः। अयम्। सुतः। तस्य। पिब। मदाय। उरुऽव्यचाः। जठरे। आ। वृषस्व। पिताऽइव। नः। शृणुहि। हूयमानः ॥ १.१०४.९

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 19 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे सभाध्यक्ष ! जिससे (त्वा) आपको (सोमकामम्) कूटे हुए पदार्थों के रस की कामना करनेवाले (आहुः) बतलाते हैं इससे आप (अर्वाङ्) अन्तरङ्ग व्यवहार में (आ, इहि) आओ, (अयम्) यह जो (सुतः) निकाला हुआ पदार्थों का रस है (तस्य) उसको (मदाय) हर्ष के लिये (पिब) पिओ, (उरुव्यचाः) जिसका बहुत और अनेक प्रकार का पूजन सत्कार है वह आप (जठरे) जिससे सब व्यवहार होते है उस पेट में (आ, वृषस्व) आसेचन कर अर्थात् उस पदार्थ को अच्छी प्रकार पीओ तथा हम लोगों से (हूयमानः) प्रार्थना को प्राप्त हुए आप (पितेव) जैसे प्रेम करता हुआ पिता पुत्र की सुनता है वैसे (नः) हमारी (शृणुहि) सुनिये ॥ ९ ॥
Essence
प्रजाजनों को चाहिये कि सभापति आदि राजपुरुषों को खान, पान, वस्त्र, धन, यान और मीठी-मीठी बातों से सदा आनन्दित बनाये रहें और राजपुरुषों को भी चाहिये कि प्रजाजनों को पुत्र के समान निरन्तर पालें ॥ ९ ॥इस सूक्त में सभापति राजा और प्रजा के करने योग्य व्यवहार के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥यह १०४ एकसौ चारवाँ सूक्त और १९ उन्नीसवाँ वर्ग पूरा हुआ ॥
Subject
फिर प्रजा को इस सभापति के साथ क्या प्रतिज्ञा करनी चाहिये, यह अगले मन्त्र में कहा है ।