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Rigveda Mandal 1 / Sukta 104 / Mantra 7

191 Sukta
9 Mantra
1/104/7
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अधा॑ मन्ये॒ श्रत्ते॑ अस्मा अधायि॒ वृषा॑ चोदस्व मह॒ते धना॑य। मा नो॒ अकृ॑ते पुरुहूत॒ योना॒विन्द्र॒ क्षुध्य॑द्भ्यो॒ वय॑ आसु॒तिं दा॑: ॥

अध॑ । म॒न्ये॒ । श्रत् । ते॒ । अ॒स्मै॒ । अ॒धा॒यि॒ । वृषा॑ । चो॒द॒स्व॒ । म॒ह॒ते । धना॑य । मा । नः॒ । अकृ॑ते । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । योनौ॑ । इन्द्र॑ । क्षुध्य॑त्ऽभ्यः । वयः॑ । आ॒ऽसु॒तिम् । दाः॒ ॥

Mantra without Swara
अधा मन्ये श्रत्ते अस्मा अधायि वृषा चोदस्व महते धनाय। मा नो अकृते पुरुहूत योनाविन्द्र क्षुध्यद्भ्यो वय आसुतिं दा: ॥

अध। मन्ये। श्रत्। ते। अस्मै। अधायि। वृषा। चोदस्व। महते। धनाय। मा। नः। अकृते। पुरुऽहूत। योनौ। इन्द्र। क्षुध्यत्ऽभ्यः। वयः। आऽसुतिम्। दाः ॥ १.१०४.७

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 19 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पुरुहूत) अनेकों से सत्कार पाये हुए (इन्द्र) परमैश्वर्य्य देने और शत्रुओं का नाश करनेहारे सभापति ! (वृषा) अति सुख वर्षानेवाले आप (अकृते) विना किये विचारे (योनौ) निमित्त में (नः) हम लोगों के (वयः) अभीष्ट अन्न और (आसुतिम्) सन्तान को (मा, दाः) मत छिन्न-भिन्न करो और (क्षुध्यद्भ्यः) भूखों के लिये अन्न, जल आदि (अधायि) धरो, हम लोगों को (महते) बहुत प्रकार के (धनाय) धन के लिये (चोदस्व) प्रेरणा कर, (अध) इसके अनन्तर (अस्मै) इस उक्त काम के लिये (ते) तेरी (श्रत्) यह श्रद्धा वा सत्य आचरण मैं (मन्ये) मानता हूँ ॥ ७ ॥
Essence
न्यायाधीश आदि राजपुरुषों को चाहिये कि जिन्होंने अपराध न किया हो उन प्रजाजनों को कभी ताड़ना न करें, सब दिन इनसे राज्य का कर धन लेवें, तथा इनको अच्छी प्रकार पाल और उन्नति दिलाकर विद्या और पुरुषार्थ के बीच प्रवृत्त कराकर आनन्दित करावें, सभापति आदि के इस सत्य काम को प्रजाजनों को सदैव मानना चाहिये ॥ ७ ॥
Subject
फिर इन दोनों को परस्पर कैसी प्रतिज्ञा करनी चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।