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Rigveda Mandal 1 / Sukta 104 / Mantra 6

191 Sukta
9 Mantra
1/104/6
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स त्वं न॑ इन्द्र॒ सूर्ये॒ सो अ॒प्स्व॑नागा॒स्त्व आ भ॑ज जीवशं॒से। मान्त॑रां॒ भुज॒मा री॑रिषो न॒: श्रद्धि॑तं ते मह॒त इ॑न्द्रि॒याय॑ ॥

सः । त्वम् । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । सूर्ये॑ । सः । अ॒प्ऽसु । अ॒ना॒गाः॒ऽत्वे । आ । भ॒ज॒ । जी॒व॒ऽशं॒से । मा । अन्त॑राम् । भुज॑म् । आ । रि॒रि॒षः॒ । नः॒ । श्रद्धि॑तम् । ते॒ । म॒ह॒ते । इ॒न्द्रि॒याय॑ ॥

Mantra without Swara
स त्वं न इन्द्र सूर्ये सो अप्स्वनागास्त्व आ भज जीवशंसे। मान्तरां भुजमा रीरिषो न: श्रद्धितं ते महत इन्द्रियाय ॥

सः। त्वम्। नः। इन्द्र। सूर्ये। सः। अप्ऽसु। अनागाःऽत्वे। आ। भज। जीवऽशंसे। मा। अन्तराम्। भुजम्। आ। रिरिषः। नः। श्रद्धितम्। ते। महते। इन्द्रियाय ॥ १.१०४.६

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 19 Mantra » 1

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Meaning
हे (इन्द्र) सभा के स्वामी ! जिन (ते) आपके (महते) बहुत और प्रशंसा करने योग्य (इन्द्रियाय) धन के लिये (नः) हम लोगों का (श्रद्धितम्) श्रद्धाभाव है (सः) वह (त्वम्) आप (नः) हम लोगों के (भुजम्) भोग करने योग्य प्रजा को (अन्तराम्) बीच में (मा) मत (आरीरिषः) रिषाइये मत मारिये और (सः) सो आप (सूर्य्ये) सूर्य्य, प्राण (अप्सु) जल (अनागास्त्वे) और निष्पाप में तथा (जीवशंसे) जिसमें जीवों की प्रशंसा स्तुति हो, उस व्यवहार में उपमा को (आ, भज) अच्छे प्रकार भेजिये ॥ ६ ॥
Essence
सभापतियों को जो प्रजाजन श्रद्धा से राज्यव्यवहार की सिद्धि के लिये बहुत धन देवें वे कभी मारने योग्य नहीं और जो प्रजाओं में डांकू वा चोर हैं वे सदैव ताड़ना देने योग्य हैं। जो सेनापति के अधिकार को पावे वह सूर्य्य के तुल्य न्यायविद्या का प्रकाश, जल के समान शान्ति और तृप्तिकर, अन्याय और अपराध का त्याग और प्रजा के प्रशंसा करने योग्य व्यवहार का सेवन कर राज्य को प्रसन्न करे ॥ ६ ॥
Subject
फिर वे कैसे अपना वर्त्ताव वर्त्तें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

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