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Rigveda Mandal 1 / Sukta 104 / Mantra 5

191 Sukta
9 Mantra
1/104/5
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्रति॒ यत्स्या नीथाद॑र्शि॒ दस्यो॒रोको॒ नाच्छा॒ सद॑नं जान॒ती गा॑त्। अध॑ स्मा नो मघवञ्चर्कृ॒तादिन्मा नो॑ म॒घेव॑ निष्ष॒पी परा॑ दाः ॥

प्रति॑ । यत् । स्या । नीथा॑ । अद॑र्शि । दस्योः॑ । ओकः॑ । न । अच्छ॑ । सद॑नम् । जा॒न॒ती । गा॒त् । अध॑ । स्म॒ । नः॒ । म॒घ॒ऽवन् । च॒र्कृ॒तात् । इत् । मा । नः॒ । म॒घाऽइ॑व । नि॒ष्ष॒पी । परा॑ । दाः॒ ॥

Mantra without Swara
प्रति यत्स्या नीथादर्शि दस्योरोको नाच्छा सदनं जानती गात्। अध स्मा नो मघवञ्चर्कृतादिन्मा नो मघेव निष्षपी परा दाः ॥

प्रति। यत्। स्या। नीथा। अदर्शि। दस्योः। ओकः। न। अच्छ। सदनम्। जानती। गात्। अध। स्म। नः। मघऽवन्। चर्कृतात्। इत्। मा। नः। मघाऽइव। निष्षपी। परा। दाः ॥ १.१०४.५

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 18 Mantra » 5

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Meaning
सभा आदि के स्वामी ने (यत्) जो (नीथा) न्याय रक्षा को पहुँचाई हुई प्रजा (दस्योः) पराया धन हरनेवाले डांकू के (ओकः) घरके (न) समान पाली सी (अदर्शि) देख पड़ती है (स्या) वह (अच्छ) अच्छा (जानती) जानती हुई (सदनम्) घरको (प्रति, गात्) प्राप्त होती अर्थात् घरको लौट जाती है। हे (मघवन्) सभा आदि के स्वामी ! (निष्षपी) स्त्री के साथ निरन्तर लगे रहनेवाले तू (नः) हम लोगों को (मघेव) जैसे धनों को वैसे (मा, परा, दाः) मत बिगाड़े (अध) इसके अनन्तर (नः) हम लोगों के (चर्कृतात्) निरन्तर करने योग्य काम से (इत्) ही विरुद्ध व्यवहार मत (स्म) दिखावे ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे अच्छा दृढ़, अच्छे प्रकार रक्षा किया हुआ घर चोरों वा शीत, गर्मी और वर्षा से मनुष्य और धन आदि पदार्थों की रक्षा करता है वैसे ही सभापति राजाओं की अच्छी पाली हुई प्रजा इनको पालती है। जैसे कामी जन अपने शरीर, धर्म, विद्या और अच्छे आचरण को बिगाड़ता और जैसे पाये हुए बहुत धनों को मनुष्य ईर्ष्या और अभिमान से अन्यायों में फँसकर बहाते हैं वैसे उक्त राजा जन प्रजा का विनाश न करे किन्तु प्रजा के किये हुए निरन्तर उपकारों को जानकर अभिमान छोड़ और प्रेम बढ़ाकर इनको सब दिन पालें और दुष्ट शत्रुजनों से डरके पलायन न करें ॥ ५ ॥
Subject
फिर वे कैसे वर्त्ताव वर्त्तें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

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