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Rigveda Mandal 1 / Sukta 104 / Mantra 4

191 Sukta
9 Mantra
1/104/4
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यु॒योप॒ नाभि॒रुप॑रस्या॒योः प्र पूर्वा॑भिस्तिरते॒ राष्टि॒ शूर॑:। अ॒ञ्ज॒सी कु॑लि॒शी वी॒रप॑त्नी॒ पयो॑ हिन्वा॒ना उ॒दभि॑र्भरन्ते ॥

यु॒योप॑ । नाभिः॑ । उप॑रस्य । आ॒योः । प्र । पूर्वा॑भिः । ति॒र॒ते॒ । राष्टि॑ । शूरः॑ । अ॒ञ्ज॒सी । कु॒लि॒शी । वी॒रऽप॑त्नी । पयः॑ । हि॒न्वा॒नाः । उ॒दऽभिः॑ । भ॒र॒न्ते॒ ॥

Mantra without Swara
युयोप नाभिरुपरस्यायोः प्र पूर्वाभिस्तिरते राष्टि शूर:। अञ्जसी कुलिशी वीरपत्नी पयो हिन्वाना उदभिर्भरन्ते ॥

युयोप। नाभिः। उपरस्य। आयोः। प्र। पूर्वाभिः। तिरते। राष्टि। शूरः। अञ्जसी। कुलिशी। वीरऽपत्नी। पयः। हिन्वानाः। उदऽभिः। भरन्ते ॥ १.१०४.४

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 18 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जब (शूरः) निडर शत्रुओं का मारनेवाला शूरवीर (प्र, पूर्वाभिः) प्रजाजनों के साथ (तिरते) राज्य का यथावत् न्याय कर पार होता और (राष्टि) उस राज्य में प्रकाशित होता है तब (आयोः) प्राप्त होने योग्य (उपरस्य) मेघ की (नाभिः) बन्धन चारों ओर से घुमड़ी हुई बादलों की दवन (युयोप) सबको मोहित करती है अर्थात् राजधर्म से प्रजासुख के लिये जलवर्षा भी होती है वह थोड़ी नहीं किन्तु (अञ्जसी) प्रसिद्ध (कुलिशी) जो सूर्य के किरणरूपी वज्र से सब प्रकार रही हुई अर्थात् सूर्य के विकट आतप से सूखने से बची हुई (वीरपत्नी) बड़ी-बड़ी नदी जिनसे बड़ा वीर समुद्र ही है वे (पयः) जल को (हिन्वानाः) हिड़ोलती हुई (उदभिः) जलों से (भरन्ते) भर जाती हैं ॥ ४ ॥
Essence
अच्छे राज्य से सब सुख प्रजा में होता है और विना अच्छे राज्य के दुःख और दुर्भिक्ष आदि उपद्रव होते हैं, इससे वीरपुरुषों को चाहिये कि रीति से राज्य पालन करें ॥ ४ ॥
Subject
फिर वे कैसे वर्ताव वर्त्तें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।