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Rigveda Mandal 1 / Sukta 103 / Mantra 6

191 Sukta
8 Mantra
1/103/6
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
भूरि॑कर्मणे वृष॒भाय॒ वृष्णे॑ स॒त्यशु॑ष्माय सुनवाम॒ सोम॑म्। य आ॒दृत्या॑ परिप॒न्थीव॒ शूरोऽय॑ज्वनो वि॒भज॒न्नेति॒ वेद॑: ॥

भूरि॑ऽकर्मणे । वृ॒ष॒भाय॑ । वृश्णे॑ । स॒त्यऽशु॑ष्माय । सु॒न॒वा॒म॒ । सोम॑म् । यः । आ॒ऽदृत्य॑ । प॒रि॒ऽप॒न्थीऽइ॑व । शूरः॑ । अय॑ज्वनः । वि॒ऽभज॑न् । एति॑ । वेदः॑ ॥

Mantra without Swara
भूरिकर्मणे वृषभाय वृष्णे सत्यशुष्माय सुनवाम सोमम्। य आदृत्या परिपन्थीव शूरोऽयज्वनो विभजन्नेति वेद: ॥

भूरिऽकर्मणे। वृषभाय। वृष्णे। सत्यऽशुष्माय। सुनवाम। सोमम्। यः। आऽदृत्य। परिऽपन्थीऽइव। शूरः। अयज्वनः। विऽभजन्। एति। वेदः ॥ १.१०३.६

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 17 Mantra » 1

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Meaning
हम लोग (यः) जो (शूरः) निडर शूरवीर पुरुष (आदृत्य) आदर सत्कार कर (परिपन्थीव) जैसे सब प्रकार से मार्ग में चले हुए डाकू दूसरे का धन आदि सर्वस्व हर लेते हैं वैसे चोरों के प्राण और उनके पदार्थों को छीन-छान हर लेवे वह (विभजन्) विभाग अर्थात् श्रेष्ठ और दुष्ट पुरुषों को अलग-अलग करता हुआ उनमें से (अयज्वनः) जो यज्ञ नहीं करते उनके (वेदः) धन को (एति) छीन लेता, उस (भूरिकर्मणे) भारी काम के करनेवाले (वृषभाय) श्रेष्ठ (वृष्णे) सुख पहुँचानेवाले (सत्यशुष्माय) नित्य बली सेनापति के लिये जैसे, (सोमम्) ऐश्वर्य्य समूह को (सुनवाम) उत्पन्न करें वैसे तुम भी करो ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जो ऐसा ढीठ है कि जैसे डाकू आदि होते हैं और साहस करता हुआ चोरों के धन आदि पदार्थों को हर सज्जनों का आदरकर पुरुषार्थी बलवान् उत्तम से उत्तम हो, उसीको सेनापति करें ॥ ६ ॥
Subject
फिर वह कैसा हो, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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