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Rigveda Mandal 1 / Sukta 103 / Mantra 5

191 Sukta
8 Mantra
1/103/5
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तद॑स्ये॒दं प॑श्यता॒ भूरि॑ पु॒ष्टं श्रदिन्द्र॑स्य धत्तन वी॒र्या॑य। स गा अ॑विन्द॒त्सो अ॑विन्द॒दश्वा॒न्त्स ओष॑धी॒: सो अ॒पः स वना॑नि ॥

तत् । अ॒स्य॒ । इ॒दम् । प॒श्य॒त॒ । भूरि॑ । पु॒ष्टम् । श्रत् । इन्द्र॑स्य । ध॒त्त॒न॒ । वी॒र्या॑य । सः । गाः । अ॒वि॒न्द॒त् । सः । अ॒वि॒न्द॒त् । अश्वा॑न् । सः । ओष॑धीः । सः । अ॒पः । सः । वना॑नि ॥

Mantra without Swara
तदस्येदं पश्यता भूरि पुष्टं श्रदिन्द्रस्य धत्तन वीर्याय। स गा अविन्दत्सो अविन्ददश्वान्त्स ओषधी: सो अपः स वनानि ॥

तत्। अस्य। इदम्। पश्यत। भूरि। पुष्टम्। श्रत्। इन्द्रस्य। धत्तन। वीर्याय। सः। गाः। अविन्दत्। सः। अविन्दत्। अश्वान्। सः। ओषधीः। सः। अपः। सः। वनानि ॥ १.१०३.५

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 16 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (सः) वह सेनापति सूर्य के तुल्य (गाः) भूमियों को (अविन्दत्) प्राप्त होता (सः) वह (अश्वान्) बड़े पदार्थों को (अविन्दत्) प्राप्त होता (सः) वह (ओषधीः) ओषधियों अर्थात् गेहूँ, उड़द, मूँग, चना आदि को प्राप्त होता (सः) वह (अपः) सूर्य्य जलों को जैसे वैसे कर्मों को प्राप्त होता (सः) तथा वह सूर्य (वनानि) किरणों को जैसे वैसे जङ्गलों को प्राप्त होता है, (अस्य) इस (इन्द्रस्य) सेना बलयुक्त सेनापति के (तत्) उस कर्म को वा (इदम्) इस (भूरि) बहुत (पुष्टम्) दृढ़ (श्रत्) सत्य के आचरण को तुम (पश्यत) देखो और (वीर्य्याय) बल होने के लिये (धत्तन) धारण करो ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जो श्रेष्ठ जनों के सत्य आचरण से प्राप्ति है, उसीको धारण करें। उसके विना सत्य पराक्रम और सब पदार्थों का लाभ नहीं होता ॥ ५ ॥
Subject
मनुष्यों को उससे कौन-कौन काम धारण करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

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