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Rigveda Mandal 1 / Sukta 103 / Mantra 4

191 Sukta
8 Mantra
1/103/4
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तदू॒चुषे॒ मानु॑षे॒मा यु॒गानि॑ की॒र्तेन्यं॑ म॒घवा॒ नाम॒ बिभ्र॑त्। उ॒प॒प्र॒यन्द॑स्यु॒हत्या॑य व॒ज्री यद्ध॑ सू॒नुः श्रव॑से॒ नाम॑ द॒धे ॥

तत् । ऊ॒चुषे॑ । मानु॑षा । इ॒मा । यु॒गानि॑ । की॒र्तेन्य॑म् । म॒घऽवा । नाम॑ । बिभ्र॑त् । उ॒प॒ऽप्र॒यन् । द॒स्यु॒ऽहत्या॑य । व॒ज्री । यत् । ह॒ । सू॒नुः । श्रव॑से । नाम॑ । द॒धे ॥

Mantra without Swara
तदूचुषे मानुषेमा युगानि कीर्तेन्यं मघवा नाम बिभ्रत्। उपप्रयन्दस्युहत्याय वज्री यद्ध सूनुः श्रवसे नाम दधे ॥

तत्। ऊचुषे। मानुषा। इमा। युगानि। कीर्तेन्यम्। मघऽवा। नाम। बिभ्रत्। उपऽप्रयन्। दस्युऽहत्याय। वज्री। यत्। ह। सूनुः। श्रवसे। नाम। दधे ॥ १.१०३.४

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 16 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जो (मघवा) बहुत धनोंवाला (सूनुः) वीर का पुत्र (वज्री) प्रशंसित शस्त्र-अस्त्र बाँधे हुए सेनापति जैसे सूर्य प्रकाशयुक्त है वैसे प्रकाशित होकर (ऊचुषे) कहने की योग्यता के लिये वा (दस्युहत्याय) जिसके लिये डाकुओं को हनन किया जाय उस (श्रवसे) धन के लिये (इमा) इन (मानुषा) मनुष्यों में होनेवाले (युगानि) वर्षों को तथा (कीर्त्तेन्यम्) कीर्त्तनीय (नाम) प्रसिद्ध और जल को (बिभ्रत्) धारण करता हुआ (उपप्रयन्) उत्तम महात्मा के समीप जाता हुआ (यत्) जिस (नाम) प्रसिद्ध काम को (दधे) धारण करता है (तत्) उस उत्तम काम को (ह) निश्चय से हम लोग भी धारण करें ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य-काल के अवयव अर्थात् संवत्सर, महीना, दिन, घड़ी आदि और जल को धारण कर सब प्राणियों के सुख के लिये अन्धकार का विनाश करके सबको सुख देता है, वैसे ही सेनापति सुखपूर्वक संवत्सर और कीर्त्ति को धारण करके शत्रुओं के मारने से सबके सुख के लिये धन को उत्पन्न करे ॥ ४ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।