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Rigveda Mandal 1 / Sukta 103 / Mantra 3

191 Sukta
8 Mantra
1/103/3
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स जा॒तूभ॑र्मा श्र॒द्दधा॑न॒ ओज॒: पुरो॑ विभि॒न्दन्न॑चर॒द्वि दासी॑:। वि॒द्वान्व॑ज्रि॒न्दस्य॑वे हे॒तिम॒स्यार्यं॒ सहो॑ वर्धया द्यु॒म्नमि॑न्द्र ॥

सः । जा॒तूऽभ॑र्मा । श्र॒त्ऽदधा॑नः । ओजः॑ । पुरः॒ । वि॒ऽभि॒न्दन् । अ॒च॒र॒त् । वि । दासीः॑ । वि॒द्वान् । व॒ज्रि॒न् । दस्य॑वे । हे॒तिम् । अ॒स्य॒ । आर्यम् । सहः॑ । व॒र्ध॒य॒ । द्यु॒म्नम् । इ॒न्द्र॒ ॥

Mantra without Swara
स जातूभर्मा श्रद्दधान ओज: पुरो विभिन्दन्नचरद्वि दासी:। विद्वान्वज्रिन्दस्यवे हेतिमस्यार्यं सहो वर्धया द्युम्नमिन्द्र ॥

सः। जातूऽभर्मा। श्रत्ऽदधानः। ओजः। पुरः। विऽभिन्दन्। अचरत्। वि। दासीः। विद्वान्। वज्रिन्। दस्यवे। हेतिम्। अस्य। आर्यम्। सहः। वर्धय। द्युम्नम्। इन्द्र ॥ १.१०३.३

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 16 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वज्रिन्) प्रशंसित शस्त्रसमूहयुक्त (इन्द्र) अच्छे-अच्छे पदार्थों के देनेवाले सेना आदि के स्वामी ! जो (जातूभर्मा) उत्पन्न हुए सांसारिक पदार्थों को धारण (श्रद्दधानः) और अच्छे कामों में प्रीति करनेवाले (विद्वान्) विद्वान् आप (अस्य) इस दुष्ट जन की (दासीः) नष्ट होनेहारीसी दासी प्रधान (पुरः) नगरियों को (दस्यवे) दुष्ट काम करते हुए जन के लिये (विभिन्दन्) विनाश करते हुए (व्यचरत्) विचरते हो (सः) वह आप श्रेष्ठ सज्जनों के लिये (हेतिम्) सुख के बढ़ानेवाले वज्र को (आर्य्यम्) श्रेष्ठ वा अति श्रेष्ठों के इस (सहः) बल (द्युम्न) धन वा (ओजः) और पराक्रम को (वर्धय) बढ़ाया करो ॥ ३ ॥
Essence
जो मनुष्य समस्त डांकू, चोर, लबाड़, लम्पट, लड़ाई करनेवालों का विनाश और श्रेष्ठों को हर्षित कर, शारीरिक और आत्मिक बल का संपादन कर, धन, आदि पदार्थों से सुख को बढ़ाता है, वही सबको श्रद्धा करने योग्य है ॥ ३ ॥
Subject
अब सेना आदि का अध्यक्ष कैसा हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।