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Rigveda Mandal 1 / Sukta 103 / Mantra 2

191 Sukta
8 Mantra
1/103/2
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स धा॑रयत्पृथि॒वीं प॒प्रथ॑च्च॒ वज्रे॑ण ह॒त्वा निर॒पः स॑सर्ज। अह॒न्नहि॒मभि॑नद्रौहि॒णं व्यह॒न्व्यं॑सं म॒घवा॒ शची॑भिः ॥

सः । धा॒र॒य॒त् । पृ॒थि॒वीम् । प॒प्रथ॑त् । च॒ । वज्रे॑ण । ह॒त्वा । निः । अ॒पः । स॒स॒र्ज॒ । अह॑न् । अहि॑म् । अभि॑नत् । रौ॒हि॒णम् । वि । अह॑न् । विऽअं॑सम् । म॒घऽवा॑ । शची॑भिः ॥

Mantra without Swara
स धारयत्पृथिवीं पप्रथच्च वज्रेण हत्वा निरपः ससर्ज। अहन्नहिमभिनद्रौहिणं व्यहन्व्यंसं मघवा शचीभिः ॥

सः। धारयत्। पृथिवीम्। पप्रथत्। च। वज्रेण। हत्वा। निः। अपः। ससर्ज। अहन्। अहिम्। अभिनत्। रौहिणम्। वि। अहन्। विऽअंसम्। मघऽवा। शचीभिः ॥ १.१०३.२

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 16 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (मघवा) सूर्य्यलोक (शचीभिः) कामों से (पृथिवीम्) पृथिवी को (धारयत्) धारण करता अपने तेज (च) और बिजुली आदि को (पप्रथत्) फैलाता उस अपने तेज से सब जगत् को प्रकाशित करता (वज्रेण) अपने किरणसमूह से मेघ को (हत्वा) मारके (अपः) जलों को (निः) (ससर्ज) निरन्तर उत्पन्न करता फिर (अहिम्) मेघ को (अहन्) हनता (रौहिणम्) रोहिणी नक्षत्र में उत्पन्न हुए मेघ को (अभिनत्) विदारण करता (व्यंसम्) (वि, अहन्) केवल साधारण ही विदारता हो सो नहीं किन्तु कटि जाँघ भुजा आदि जिसकी ऐसे रुण्ड, मुण्ड, मुचण्ड, उद्दण्ड, वीर के समान विशेष करके मेघों को हनता है (सः) वह सूर्य्यलोक ईश्वर ने रचा है, यह जानो ॥ २ ॥
Essence
मनुष्यों को यह देखना चाहिये कि प्रसिद्ध जो सूर्यलोक है वह मेघों के विदारण, लोकों के खींचने और प्रकाश आदि कामों से जल, वर्षा, पृथिवी को धारण और अप्रकट अर्थात् अन्धकार से ढंपे हुए जो पदार्थ हैं उनको प्रकाशित कर सब प्राणियों को व्यवहार में चलाता है, वह परमात्मा के बनाने के विना उत्पन्न नहीं हो सकता ॥ २ ॥
Subject
अब इस जगत् में परमेश्वर से बनाया हुआ यह सूर्य्य कौन काम करता है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।