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Rigveda Mandal 1 / Sukta 102 / Mantra 8

191 Sukta
11 Mantra
1/102/8
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
त्रि॒वि॒ष्टि॒धातु॑ प्रति॒मान॒मोज॑सस्ति॒स्रो भूमी॑र्नृपते॒ त्रीणि॑ रोच॒ना। अती॒दं विश्वं॒ भुव॑नं ववक्षिथाश॒त्रुरि॑न्द्र ज॒नुषा॑ स॒नाद॑सि ॥

त्रि॒वि॒ष्टि॒ऽधातु॑ । प्र॒ति॒ऽमानम् । ओज॑सः । ति॒स्रः । भूमीः॑ । नृ॒ऽप॒ते॒ । त्रीणि॑ । रो॒च॒ना । अति॑ । इ॒दम् । विश्व॑म् । भुव॑नम् । व॒व॒क्षि॒थ॒ । अ॒श॒त्रुः । इ॒न्द्र॒ । ज॒नुषा॑ । स॒नात् । अ॒सि॒ ॥

Mantra without Swara
त्रिविष्टिधातु प्रतिमानमोजसस्तिस्रो भूमीर्नृपते त्रीणि रोचना। अतीदं विश्वं भुवनं ववक्षिथाशत्रुरिन्द्र जनुषा सनादसि ॥

त्रिविष्टिऽधातु। प्रतिऽमानम्। ओजसः। तिस्रः। भूमीः। नृऽपते। त्रीणि। रोचना। अति। इदम्। विश्वम्। भुवनम्। ववक्षिथ। अशत्रुः। इन्द्र। जनुषा। सनात्। असि ॥ १.१०२.८

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 15 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नृपते) मनुष्यों के स्वामी ईश्वर वा राजन् ! (इन्द्र) बहुत ऐश्वर्य से युक्त (अशत्रुः) शत्रुरहित आप (त्रिविष्टिधातु) जिसमें तीन प्रकार की पृथिवी, जल, तेज, पवन, आकाश की व्याप्ति अर्थात् परिपूर्णता है, उस संसार की (प्रतिमानम्) परिमाण वा उपमान जैसे हो वैसे (सनात्) सनातन कारण वा (ओजसः) बल वा (जनुषा) उत्पन्न किये हुए काम से (तिस्रः) तीन प्रकार (भूमीः) अर्थात् नीचली, ऊपरली, और बीचली उत्तम, अधम और मध्यम भूमि तथा (त्रीणि) तीन प्रकार के (रोचना) प्रकाशयुक्त विद्या, शब्द और सूर्य्य और न्याय करने, बल और राज्यपालन आदि काम के तुम दोनों यथायोग्य निर्वाह करनेवाले (असि) हो और उक्त पञ्चभूतमय (इदम्) इस (विश्वम्) समस्त (भुवनम्) जिसमें कि प्राणी होते हैं उस जगत् के (अति, ववक्षिथ) अतीव निर्वाह करने की इच्छा करते हो, इससे ईश्वर उपासना करने योग्य और विद्वान् आप सत्कार करने योग्य हो ॥ ८ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जिसकी उपमा नहीं है, उस ईश्वर ने कारण से सब कार्य्यरूप जगत् को रच और उसकी रक्षाकर उसका संहार किया है, वही इष्टदेव मानने योग्य है तथा जो अतुल सामर्थ्ययुक्त सभापति प्रसिद्ध न्याय आदि गुणों से समस्त राज्य को सन्तोषित करता है, सो भी सदा सत्कार करने योग्य है ॥ ८ ॥
Subject
अब ईश्वर और सभापति कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।