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Rigveda Mandal 1 / Sukta 102 / Mantra 7

191 Sukta
11 Mantra
1/102/7
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
उत्ते॑ श॒तान्म॑घव॒न्नुच्च॒ भूय॑स॒ उत्स॒हस्रा॑द्रिरिचे कृ॒ष्टिषु॒ श्रव॑:। अ॒मा॒त्रं त्वा॑ धि॒षणा॑ तित्विषे म॒ह्यधा॑ वृ॒त्राणि॑ जिघ्नसे पुरंदर ॥

उत् । ते॒ । श॒तात् । म॒घ॒ऽव॒न् । उत् । च॒ भूय॑सः । उत् । स॒हस्रा॑त् । रि॒रि॒चे॒ । कृ॒ष्टिषु॑ । श्रवः॑ । अ॒मा॒त्रम् । त्वा॒ । धि॒षणा॑ । ति॒त्वि॒षे॒ । म॒ही । अध॑ । वृ॒त्राणि॑ । जि॒घ्न॒से॒ । पु॒र॒म्ऽद॒र॒ ॥

Mantra without Swara
उत्ते शतान्मघवन्नुच्च भूयस उत्सहस्राद्रिरिचे कृष्टिषु श्रव:। अमात्रं त्वा धिषणा तित्विषे मह्यधा वृत्राणि जिघ्नसे पुरंदर ॥

उत्। ते। शतात्। मघऽवन्। उत्। च भूयसः। उत्। सहस्रात्। रिरिचे। कृष्टिषु। श्रवः। अमात्रम्। त्वा। धिषणा। तित्विषे। मही। अध। वृत्राणि। जिघ्नसे। पुरम्ऽदर ॥ १.१०२.७

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 15 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) असंख्यात ऐश्वर्य्य से युक्त सेनापति ! (ते) आपका (कृष्टिषु) मनुष्यों में (श्रवः) कीर्त्तन, श्रवण वा धन (शतात्) सैकड़ों से (उत्) ऊपर (रिरिचे) निकल गया (सहस्रात्) हजारों से (उत्) ऊपर (च) और (भूयसः) अधिक से भी (उत्) ऊपर अर्थात् अधिक निकल गया। (अध) इसके अनन्तर (अमात्रम्) परिमाणरहित (त्वा) आपकी (मही) महागुणयुक्त (धिषणा) विद्या और अच्छी शिक्षा को पाये हुई वाणी वा बुद्धि (तित्विषे) प्रकाशित करती है। हे (पुरन्दर) शत्रुओं के पुरों के विदारनेवाले ! (वृत्राणि) जैसे मेघ के अङ्ग अर्थात् बद्दलों को सूर्य्य हनन करता है, वैसे आप शत्रुओं को (जिघ्नसे) मारते हो ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे सूर्य्य अन्धकार और मेघ आदि का हनन करके अपरिमित अर्थात् जिसका परिमाण न हो सके, उस अपने तेज को प्रकाशित करके सब तेजवाले पदार्थों में बढ़के वर्त्तमान है, वैसे विद्वान् को सभा का अधीश मानके शत्रुओं को जीतें ॥ ७ ॥
Subject
फिर वह कैसा और क्या करता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।