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Rigveda Mandal 1 / Sukta 102 / Mantra 3

191 Sukta
11 Mantra
1/102/3
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
तं स्मा॒ रथं॑ मघव॒न्प्राव॑ सा॒तये॒ जैत्रं॒ यं ते॑ अनु॒मदा॑म संग॒मे। आ॒जा न॑ इन्द्र॒ मन॑सा पुरुष्टुत त्वा॒यद्भ्यो॑ मघव॒ञ्छर्म॑ यच्छ नः ॥

तम् । स्म॒ । रथ॑म् । म॒घ॒ऽव॒न् । प्र । अव॑ । सा॒तये॑ । जैत्र॑म् । यम् । ते॒ । अ॒नु॒ऽमदा॑म । स॒म्ऽग॒मे । आ॒जा । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । मन॑सा । पु॒रु॒ऽस्तु॒त॒ । त्वा॒यत्ऽभ्यः॑ । म॒घ॒ऽव॒न् । शर्म॑ । य॒च्छ॒ । नः॒ ॥

Mantra without Swara
तं स्मा रथं मघवन्प्राव सातये जैत्रं यं ते अनुमदाम संगमे। आजा न इन्द्र मनसा पुरुष्टुत त्वायद्भ्यो मघवञ्छर्म यच्छ नः ॥

तम्। स्म। रथम्। मघऽवन्। प्र। अव। सातये। जैत्रम्। यम्। ते। अनुऽमदाम। सम्ऽगमे। आजा। नः। इन्द्र। मनसा। पुरुऽस्तुत। त्वायत्ऽभ्यः। मघऽवन्। शर्म। यच्छ। नः ॥ १.१०२.३

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 14 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) प्रशंसित और मान करने योग्य धनयुक्त (इन्द्र) परमैश्वर्य्य के देनेवाले सेना के अधिपति ! आप (नः) हम लोगों के (सातये) बहुत से धन की प्राप्ति होने के लिये (जैत्रम्) जिससे संग्रामों में जीतें (तम्) उस (स्म) अद्भुत-अद्भुत गुणों को प्रकाशित करनेवाले (रथम्) विमान आदि रथसमूह को जुता के (आजा) जहाँ शत्रुओं से वीर जा-जा मिलें, उस (सङ्गमे) संग्राम में (प्र, अव) पहुँचाओ अर्थात् अपने रथ को वहाँ लेजाओ, कौन रथ को ? कि (यम्) जिस (ते) आपके रथ को हम लोग (अनु, मदाम) पीछे से सराहें। हे (पुरुष्टुत) बहुत शूरवीर जनों से प्रशंसा को प्राप्त (मघवन्) प्रशंसित धनयुक्त ! आप (मनसा) विशेष ज्ञान से (त्वायद्भ्यः) अपने को आपकी चाहना करते हुए (नः) हम लोगों के लिये अद्भुत (शर्म) सुख को (यच्छ) देओ ॥ ३ ॥
Essence
जब शूरवीर सेवकों के साथ सेनापति को संग्राम करने को जाना होता है, तब परस्पर अर्थात् एक-दूसरे का उत्साह बढ़ाके अच्छे प्रकार रक्षा, शत्रुओं के साथ अच्छा युद्ध, उनकी हार और जनों को आनन्द देकर शत्रुओं को भी किसी प्रकार सन्तोष देकर सदा अपना वर्त्ताव रखना चाहिये ॥ ३ ॥
Subject
फिर सेना का अधिपति क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।