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Rigveda Mandal 1 / Sukta 102 / Mantra 2

191 Sukta
11 Mantra
1/102/2
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- स्वराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒स्य श्रवो॑ न॒द्य॑: स॒प्त बि॑भ्रति॒ द्यावा॒क्षामा॑ पृथि॒वी द॑र्श॒तं वपु॑:। अ॒स्मे सू॑र्याचन्द्र॒मसा॑भि॒चक्षे॑ श्र॒द्धे कमि॑न्द्र चरतो वितर्तु॒रम् ॥

अ॒स्य । श्रवः॑ । न॒द्यः॑ । स॒प्त । बि॒भ्र॒ति॒ । द्यावा॒क्षामा॑ । पृ॒थि॒वी । द॒र्श॒तम् । वपुः॑ । अ॒स्मे इति॑ । सू॒र्या॒च॒न्द्र॒मसा॑ । अ॒भि॒ऽचक्षे॑ । श्र॒द्धे । कम् । इ॒न्द्र॒ । च॒र॒तः॒ । वि॒ऽत॒र्तु॒रम् ॥

Mantra without Swara
अस्य श्रवो नद्य: सप्त बिभ्रति द्यावाक्षामा पृथिवी दर्शतं वपु:। अस्मे सूर्याचन्द्रमसाभिचक्षे श्रद्धे कमिन्द्र चरतो वितर्तुरम् ॥

अस्य। श्रवः। नद्यः। सप्त। बिभ्रति। द्यावाक्षामा। पृथिवी। दर्शतम्। वपुः। अस्मे इति। सूर्याचन्द्रमसा। अभिऽचक्षे। श्रद्धे। कम्। इन्द्र। चरतः। विऽतर्तुरम् ॥ १.१०२.२

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 14 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्य के देनेवाले ! (अस्य) निःशेष विद्यायुक्त जगदीश्वर का वा समस्त विद्या पढ़ानेहारे आप लोगों का (श्रवः) सामर्थ्य वा अन्न और (सप्त) सात प्रकार की स्वादयुक्त जलवाली (नद्यः) नदी (दर्शतम्) देखने और (वितर्त्तुरम्) अनेक प्रकार के नौका आदि पदार्थों से तरने योग्य महानद में तरने के अर्थ (कम्) सुख करनेहारे (वपुः) रूप को (बिभ्रति) धारण करती वा पोषण कराती तथा (द्यावाक्षामा) प्रकाश और भूमि मिलकर वा (पृथिवी) अन्तरिक्ष (सूर्याचन्द्रमसा) सूर्य और चन्द्रमा आदि लोक धरते पुष्ट कराते हैं, ये सब (अस्मे) हम लोगों के (अभिचक्षे) सुख के सम्मुख देखने (श्रद्धे) और श्रद्धा कराने के लिये प्रकाश और भूमि वा सूर्य-चन्द्रमा दो-दो (चरतः) प्राप्त होते तथा अन्तरिक्ष प्राप्त होता और भी उक्त पदार्थ प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। परमेश्वर की रचना से पृथिवी आदि लोक और उनमें रहनेवाले पदार्थ अपने-अपने रूप को धारण करके सब प्राणियों के देखने और श्रद्धा के लिये हो और सुख को उत्पन्न कर चालचलन के निमित्त होते हैं परन्तु किसी प्रकार विद्या के विना इन सांसारिक पदार्थों से सुख नहीं होता, इससे सबको चाहिये कि ईश्वर की उपासना और विद्वानों के सङ्ग से लोकसम्बन्धी विद्या को पाकर सदा सुखी होवें ॥ २ ॥
Subject
अब ईश्वर और अध्यापक के काम से क्या होता है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।