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Rigveda Mandal 1 / Sukta 102 / Mantra 10

191 Sukta
11 Mantra
1/102/10
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वं जि॑गेथ॒ न धना॑ रुरोधि॒थार्भे॑ष्वा॒जा म॑घवन्म॒हत्सु॑ च। त्वामु॒ग्रमव॑से॒ सं शि॑शीम॒स्यथा॑ न इन्द्र॒ हव॑नेषु चोदय ॥

त्वम् । जि॒गे॒थ॒ । न । धना॑ । रु॒रो॒धि॒थ॒ । अर्भे॑षु । आ॒जा । म॒घ॒ऽव॒न् । म॒हत्ऽसु॑ । च॒ । त्वाम् । उ॒ग्रम् । अव॑से । सम् । शि॒शी॒म॒सि॒ । अथ॑ । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । हव॑नेषु । चो॒द॒य॒ ॥

Mantra without Swara
त्वं जिगेथ न धना रुरोधिथार्भेष्वाजा मघवन्महत्सु च। त्वामुग्रमवसे सं शिशीमस्यथा न इन्द्र हवनेषु चोदय ॥

त्वम्। जिगेथ। न। धना। रुरोधिथ। अर्भेषु। आजा। मघऽवन्। महत्ऽसु। च। त्वाम्। उग्रम्। अवसे। सम्। शिशीमसि। अथ। नः। इन्द्र। हवनेषु। चोदय ॥ १.१०२.१०

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 15 Mantra » 5

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Meaning
हे (मघवन्) परम सराहने योग्य धन आदि सामग्री लिये हुए (इन्द्र) शत्रुओं के विदारनेवाले सेनापति ! जो (त्वम्) आप चतुरङ्ग अर्थात् चौतरफी नाकेबन्दी की सेना सहित (अर्भेषु) थोड़े (महत्सु) बड़े (च) और मध्यम (आजा) संग्रामों में शत्रुओं को (जिगेथ) जीते हुए हो और उक्त संग्रामों में (धना) धन आदि पदार्थों को (न)(रुरोधिथ) रोकते हो, उन (उग्रम्) शत्रुओं के बल को विदीर्ण करने में अत्यन्त बली (त्वाम्) आपको (अवसे) रक्षा आदि के लिये स्वीकार करके हम लोग शत्रुओं को (संशिशीमसि) अच्छे प्रकार निर्मूल नष्ट करते हैं, (अथ) इसके अनन्तर आप भी ऐसा कीजिये कि (हवनेषु) ग्रहण करने योग्य कामों में (नः) हम लोगों को (चोदय) प्रवृत्त कराइये ॥ १० ॥
Essence
जो मनुष्य शत्रुओं और समय को पाकर धनों को जीतने, श्रेष्ठ कामों में सबको लगाने और दुष्टों को छिन्न-भिन्न करनेवाला हो, वही सबको सेनाओं का अधीश मानना चाहिये ॥ १० ॥
Subject
फिर वह क्या करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

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