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Rigveda Mandal 1 / Sukta 101 / Mantra 9

191 Sukta
11 Mantra
1/101/9
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वा॒येन्द्र॒ सोमं॑ सुषुमा सुदक्ष त्वा॒या ह॒विश्च॑कृमा ब्रह्मवाहः। अधा॑ नियुत्व॒: सग॑णो म॒रुद्भि॑र॒स्मिन्य॒ज्ञे ब॒र्हिषि॑ मादयस्व ॥

त्वा॒ऽया । इ॒न्द्र॒ । सोम॑म् । सु॒सु॒म॒ । सु॒ऽद॒क्ष॒ । त्वा॒ऽया । ह॒विः । च॒कृ॒म॒ । ब्र॒ह्म॒ऽवा॒हः॒ । अध॑ । नि॒ऽयु॒त्वः॒ । सऽग॑णः । म॒रुत्ऽभिः॑ । अ॒स्मिन् । य॒ज्ञे । ब॒र्हिषि॑ । मा॒द॒य॒स्व॒ ॥

Mantra without Swara
त्वायेन्द्र सोमं सुषुमा सुदक्ष त्वाया हविश्चकृमा ब्रह्मवाहः। अधा नियुत्व: सगणो मरुद्भिरस्मिन्यज्ञे बर्हिषि मादयस्व ॥

त्वाऽया। इन्द्र। सोमम्। सुसुम। सुऽदक्ष। त्वाऽया। हविः। चकृम। ब्रह्मऽवाहः। अध। निऽयुत्वः। सऽगणः। मरुत्ऽभिः। अस्मिन्। यज्ञे। बर्हिषि। मादयस्व ॥ १.१०१.९

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 13 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्रः) परम विद्यारूपी ऐश्वर्य से युक्त विद्वान् ! (त्वाया) आपके साथ हुए हम लोग (सोमम्) ऐश्वर्य करनेवाले के बोध को (सुसुम) प्राप्त हों। हे (सुदक्ष) उत्तम चतुराईयुक्त बल और (ब्रह्मवाहः) अनन्तधन तथा वेदविद्या की प्राप्ति करानेहारे विद्वान् ! (त्वाया) आपके सहित हम लोग (हविः) क्रियाकौशलयुक्त काम का (चकृम) विधान करें। हे (नियुत्वः) समर्थ ! (अधा) इसके अनन्तर (मरुद्भिः) ऋत्विज् अर्थात् पढ़ानेवालों और (सगणः) अपने विद्यार्थियों के गोलों के साथ वर्त्तमान आप (अस्मिन्) इस (बर्हिषि) अत्यन्त उत्तम (यज्ञे) पढ़ने-पढ़ाने के सत्कार से पाये हुए व्यवहार में (मादयस्व) आनन्दित होओ और हम लोगों को आनन्दित करो ॥ ९ ॥
Essence
विद्वानों के सङ्ग के विना निश्चय है कि कोई ऐश्वर्य्य और आनन्द को नहीं पा सकता है, इससे नव मनुष्य विद्वानों का सदा सत्कार कर इनसे विद्या और अच्छी-अच्छी शिक्षाओं को प्राप्त होकर सब प्रकार से सत्कार युक्त होवें ॥ ९ ॥
Subject
फिर उसके सङ्ग से क्या करना चाहिये और वह हम लोगों के यज्ञ में क्या करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।