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Rigveda Mandal 1 / Sukta 101 / Mantra 5

191 Sukta
11 Mantra
1/101/5
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यो विश्व॑स्य॒ जग॑तः प्राण॒तस्पति॒र्यो ब्र॒ह्मणे॑ प्रथ॒मो गा अवि॑न्दत्। इन्द्रो॒ यो दस्यूँ॒रध॑राँ अ॒वाति॑रन्म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे ॥

यः । विश्व॑स्य । जग॑तः । प्रा॒ण॒तः । पतिः॑ । यः । ब्र॒ह्मणे॑ । प्रथ॒मः । गाः । अवि॑न्दत् । इन्द्रः॑ । यः । दस्यू॑न् । अध॑रान् । अ॒व॒ऽअति॑रत् । म॒रुत्व॑न्तम् । स॒ख्याय॑ । ह॒वा॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
यो विश्वस्य जगतः प्राणतस्पतिर्यो ब्रह्मणे प्रथमो गा अविन्दत्। इन्द्रो यो दस्यूँरधराँ अवातिरन्मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥

यः। विश्वस्य। जगतः। प्राणतः। पतिः। यः। ब्रह्मणे। प्रथमः। गाः। अविन्दत्। इन्द्रः। यः। दस्यून्। अधरान्। अवऽअतिरत्। मरुत्वन्तम्। सख्याय। हवामहे ॥ १.१०१.५

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 12 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो उत्तम दानशील (प्रथमः) सबका विख्यात करनेवाला (इन्द्रः) इन्द्रियों से युक्त जीव (ब्रह्मणे) चारों वेदों के जाननेवाले के लिये (गाः) पृथिवी, इन्द्रियों और प्रकाशयुक्त लोकों को (अविन्दत्) प्राप्त होता वा (यः) जो शूरता आदि गुणवाला वीर (दस्यून्) हठ से औरों का धन हरनेवालों को (अधरान्) नीचता को प्राप्त कराता हुआ (अवातिरत्) अधोगति को पहुँचाता वा (यः) जो सेनाधिपति (विश्वस्य) समग्र (जगतः) जङ्गमरूप (प्राणतः) जीवते जीवसमूह का (पतिः) अधिपति अर्थात् स्वामी हो, उस (मरुत्वन्तम्) अपने समीप पढ़ानेवालों को रखनेवाले सभाध्यक्ष को हम लोग (सख्याय) मित्रपन के लिये (हवामहे) स्वीकार करते हैं ॥ ५ ॥
Essence
पुरुषार्थ के विना विद्या, अन्न और धन की प्राप्ति तथा शत्रुओं का पराजय नहीं हो सकता, जो धार्मिक सेनाध्यक्ष सुहृद्भाव से अपने प्राण के समान सबको प्रसन्न करता है, उस पुरुष को निश्चय है कि कभी दुःख नहीं होता, इससे उक्त विषय का आचरण सदा करना चाहिये ॥ ५ ॥
Subject
अब सेनाध्यक्ष कैसा होता है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।