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Rigveda Mandal 1 / Sukta 101 / Mantra 3

191 Sukta
11 Mantra
1/101/3
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यस्य॒ द्यावा॑पृथि॒वी पौंस्यं॑ म॒हद्यस्य॑ व्र॒ते वरु॑णो॒ यस्य॒ सूर्य॑:। यस्येन्द्र॑स्य॒ सिन्ध॑व॒: सश्च॑ति व्र॒तं म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे ॥

यस्य॑ । द्यावा॑पृथि॒वी इति॑ । पौंस्य॑म् । म॒हत् । यस्य॑ । व्र॒ते । वरु॑णः । यस्य॑ । सूर्यः॑ । यस्य॑ । इन्द्र॑स्य । सिन्ध॑वः । सश्च॑ति । व्र॒तम् । म॒रुत्व॑न्तम् । स॒ख्याय॑ । ह॒वा॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
यस्य द्यावापृथिवी पौंस्यं महद्यस्य व्रते वरुणो यस्य सूर्य:। यस्येन्द्रस्य सिन्धव: सश्चति व्रतं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥

यस्य। द्यावापृथिवी इति। पौंस्यम्। महत्। यस्य। व्रते। वरुणः। यस्य। सूर्यः। यस्य। इन्द्रस्य। सिन्धवः। सश्चति। व्रतम्। मरुत्वन्तम्। सख्याय। हवामहे ॥ १.१०१.३

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 12 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हम लोग (यस्य) जिस (इन्द्रस्य) परमैश्वर्य्यवान् जगदीश्वर वा सभाध्यक्ष राजा के (व्रते) सामर्थ्य वा शील में (महत्) अत्यन्त उत्तमगुण और (पौंस्यम्) पुरुषार्थयुक्त बल है (यस्य) जिसका (द्यावापृथिवी) सूर्य्य और भूमि के सदृश सहनशीलता और नीति का प्रकाश वर्त्तमान है (यस्य) जिसके (व्रतम्) सामर्थ्य वा शील को (वरुणः) चन्द्रमा वा चन्द्रमा का शान्ति आदि गुण (यस्य) जिसके सामर्थ्य और शील को (सूर्यः) सूर्यमण्डल वा उसका गुण (सश्चति) प्राप्त होता और (सिन्धवः) समुद्र प्राप्त होते हैं, उस (मरुत्वन्तम्) समस्त प्राणियों से और समय-समय पर यज्ञादि करनेहारों से युक्त सभाध्यक्ष को (सख्याय) मित्र के काम वा मित्रपन के लिये (हवामहे) स्वीकार करते हैं ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जिस परमेश्वर के सामर्थ्य के विना पृथिवी आदि लोकों की स्थिति अच्छे प्रकार नहीं होती तथा जिस सभाध्यक्ष के स्वभाव और वर्त्ताव की प्रकाश के समान विद्या, पृथिवी के समान सहनशीलता, चन्द्रमा के तुल्य शान्ति, सूर्य्य के तुल्य नीति का प्रकाश और समुद्र के समान गम्भीरता है, उसको छोड़के और को अपना मित्र न करें ॥ ३ ॥
Subject
अब ईश्वर और सभाध्यक्ष कैसे-कैसे गुणवाले होते हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।