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Rigveda Mandal 1 / Sukta 101 / Mantra 2

191 Sukta
11 Mantra
1/101/2
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यो व्यं॑सं जाहृषा॒णेन॑ म॒न्युना॒ यः शम्ब॑रं॒ यो अह॒न्पिप्रु॑मव्र॒तम्। इन्द्रो॒ यः शुष्ण॑म॒शुषं॒ न्यावृ॑णङ्म॒रुत्व॑न्तं स॒ख्याय॑ हवामहे ॥

यः । विऽअं॑सम् । ज॒हृ॒षा॒णेन॑ । म॒न्युना॑ । यः । शम्ब॑रम् । यः । अह॑न् । पिप्रु॑म् । अ॒व्र॒तम् । इन्द्रः॑ । यः । शुष्ण॑म् । अ॒शुष॑म् । नि । अवृ॑णक् । म॒रुत्व॑न्तम् । स॒ख्याय॑ । ह॒वा॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
यो व्यंसं जाहृषाणेन मन्युना यः शम्बरं यो अहन्पिप्रुमव्रतम्। इन्द्रो यः शुष्णमशुषं न्यावृणङ्मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे ॥

यः। विऽअंसम्। जहृषाणेन। मन्युना। यः। शम्बरम्। यः। अहन्। पिप्रुम्। अव्रतम्। इन्द्रः। यः। शुष्णम्। अशुषम्। नि। अवृणक्। मरुत्वन्तम्। सख्याय। हवामहे ॥ १.१०१.२

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 12 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो सभा सेना आदि का अधिपति (इन्द्रः) समस्त ऐश्वर्य को प्राप्त (जाहृषाणेन) सज्जनों को सन्तोष देनेवाले (मन्युना) अपने क्रोधों से दुष्ट और शत्रुजनों को (व्यंसम् नि, अहन्) ऐसा मारे कि जिससे कन्धा अलग हो जाए वा (यः) जो शूरता आदि गुणों से युक्त वीर (शम्बरम्) अधर्म से सम्बन्ध करनेवाले को अत्यन्त मारे वा (यः) धर्मात्मा सज्जन पुरुष (पिप्रुम्) जो कि अधर्मी अपना पेट भरता उसको निरन्तर मारे और (यः) जो अति बलवान् (अव्रतम्) जिसके कोई नियम नहीं अर्थात् ब्रह्मचर्य सत्यपालन आदि व्रतों को नहीं करता उसको (अवृणक्) अपने से अलग करे, उस (शुष्णम्) बलवान् (अशुषम्) शोकरहित हर्षयुक्त (मरुत्वन्तम्) अच्छे प्रशंसित पढ़नेवालों को रखनेहारे सकल ऐश्वर्ययुक्त सभापति को (सख्याय) मित्रों के काम वा मित्रपन के लिये हम लोग (हवामहे) स्वीकार करते हैं ॥ २ ॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि जो चमकते हुए क्रोध से दुष्टों को मारकर विद्या की उन्नति के लिये ब्रह्मचर्यादि नियमों को प्रचरित और मूर्खपन और खोटी सिखावटों को रोकके सबके सुखके लिये निरन्तर अच्छा यत्न करे, वही मित्र मानने योग्य है ॥ २ ॥
Subject
अब सभा और सेना का अध्यक्ष क्या करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।