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Rigveda Mandal 1 / Sukta 101 / Mantra 10

191 Sukta
11 Mantra
1/101/10
Devata- इन्द्र: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मा॒दय॑स्व॒ हरि॑भि॒र्ये त॑ इन्द्र॒ वि ष्य॑स्व॒ शिप्रे॒ वि सृ॑जस्व॒ धेने॑। आ त्वा॑ सुशिप्र॒ हर॑यो वहन्तू॒शन्ह॒व्यानि॒ प्रति॑ नो जुषस्व ॥

मा॒द्य॑स्व । हरि॑ऽभिः । ये । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । वि । स्य॒स्व॒ । शिप्रे॑ । वि । सृ॒ज॒स्व॒ । धेने॒ इति॑ । आ । त्वा॒ । सु॒ऽशि॒प्र॒ । हर॑यः । व॒ह॒न्तु॒ । उ॒शन् । ह॒व्यानि॑ । प्रति॑ । नः॒ । जु॒ष॒स्व॒ ॥

Mantra without Swara
मादयस्व हरिभिर्ये त इन्द्र वि ष्यस्व शिप्रे वि सृजस्व धेने। आ त्वा सुशिप्र हरयो वहन्तूशन्हव्यानि प्रति नो जुषस्व ॥

मादयस्व। हरिऽभिः। ये। ते। इन्द्र। वि। स्यस्व। शिप्रे। वि। सृजस्व। धेने इति। आ। त्वा। सुऽशिप्र। हरयः। वहन्तु। उशन्। हव्यानि। प्रति। नः। जुषस्व ॥ १.१०१.१०

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 13 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सुशिप्र) अच्छा सुख पहुँचानेवाले (इन्द्र) परमैश्वर्य्ययुक्त सेना के अधीश ! (ये) जो (ते) आपके प्रशंसित युद्ध में अतिप्रवीण और उत्तमता से चालें सिखाये हुए घोड़े हैं, उन (हरिभिः) घोड़ों से (नः) हम लोगों को (मादयस्व) आनन्दित कीजिये (शिप्रे) और सर्व सुखप्राप्ति कराने तथा (धेने) वाणी के समान समस्त आनन्द रस को देनेहारे आकाश और भूमि लोक को (विष्यस्व) अपने राज्य से निरन्तर प्राप्त हो (विसृजस्व) और छोड़ अर्थात् वृद्धावस्था में तप करने के लिये उस राज्य को छोड़दे, जो (हरयः) घोड़े (त्वाम्) आपको (आ, वहन्तु) ले चलते हैं, जिनसे (उशन्) आप अनेक प्रकार की कामनाओं को करते हुए (हव्यानि) ग्रहण करने योग्य युद्ध आदि के कामों को सेवन करते हैं, उन कामों के प्रति (नः) हम लोगों को (जुषस्व) प्रसन्न कीजिये ॥ १० ॥
Essence
सेनापति को चाहिये कि सेना के समस्त अङ्गों को पूर्ण बलयुक्त और अच्छी-अच्छी शिक्षा दे, उनको युद्ध के योग्य सिद्ध कर, समस्त विघ्नों की निवृत्ति कर और अपने राज्य की उत्तम रक्षा करके सब प्रजा को निरन्तर आनन्दित करे ॥ १० ॥
Subject
फिर सेना आदि का अध्यक्ष क्या करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।