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Rigveda Mandal 1 / Sukta 100 / Mantra 9

191 Sukta
19 Mantra
1/100/9
Devata- इन्द्र: Rishi- वृषागिरो महाराजस्य पुत्रभूता वार्षागिरा ऋज्राश्वाम्बरीषसहदेवभयमानसुराधसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स स॒व्येन॑ यमति॒ व्राध॑तश्चि॒त्स द॑क्षि॒णे संगृ॑भीता कृ॒तानि॑। स की॒रिणा॑ चि॒त्सनि॑ता॒ धना॑नि म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥

सः । स॒व्येन॑ । य॒म॒ति॒ । व्राध॑तः । चि॒त् । सः । द॒क्षि॒णे । सम्ऽगृ॑भीता । कृ॒तानि॑ । सः । की॒रिणा॑ । चि॒त् । सनि॑ता । धना॑नि । म॒रुत्वा॑न् । नः॒ । भ॒व॒तु॒ । इन्द्रः॑ । ऊ॒ती ॥

Mantra without Swara
स सव्येन यमति व्राधतश्चित्स दक्षिणे संगृभीता कृतानि। स कीरिणा चित्सनिता धनानि मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥

सः। सव्येन। यमति। व्राधतः। चित्। सः। दक्षिणे। सम्ऽगृभीता। कृतानि। सः। कीरिणा। चित्। सनिता। धनानि। मरुत्वान्। नः। भवतु। इन्द्रः। ऊती ॥ १.१००.९

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 9 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जो (सव्येन) सेना के दाहिनी ओर खड़ी हुई अपनी सेना से (व्राधतः) अत्यन्त बल बढ़े हुए शत्रुओं को (चित्) भी (यमति) ढङ्ग में चलाता है, वह उन शत्रुओं का जीतनेहारा होता है। जो (दक्षिणे) दाहिनी ओर में खड़ी हुई उस सेना से (संगृभीता) ग्रहण किये हुए सेना के अङ्गों तथा (कृतानि) किये हुए कामों को यथोचित नियम में लाता है (सः) वह अपनी सेना की रक्षा कर सकता है। जो (कीरिणा) शत्रुओं के गिराने के प्रबन्ध से (चित्) भी उनके (सनिता) अच्छी प्रकार इकठ्ठे किये हुए (धनानि) धनों को ले लेता है (सः) वह (मरुत्वान्) अपनी सेना में उत्तम-उत्तम वीरों को राखनेहारा (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् सेनापति (नः) हम लोगों के (ऊती) रक्षा आदि व्यवहारों के लिये (भवतु) हो ॥ ९ ॥
Essence
जो सेना की रचनाओं और सेना के अङ्गों की शिक्षा वा रक्षा के विशेष ज्ञान को तथा पूर्ण युद्ध की सामग्री को इकठ्ठा कर सकता है, वही शत्रुओं को जीत लेने से अपनी और प्रजा की रक्षा करने के योग्य है ॥ ९ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।