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Rigveda Mandal 1 / Sukta 100 / Mantra 2

191 Sukta
19 Mantra
1/100/2
Devata- इन्द्र: Rishi- वृषागिरो महाराजस्य पुत्रभूता वार्षागिरा ऋज्राश्वाम्बरीषसहदेवभयमानसुराधसः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यस्याना॑प्त॒: सूर्य॑स्येव॒ यामो॒ भरे॑भरे वृत्र॒हा शुष्मो॒ अस्ति॑। वृष॑न्तम॒: सखि॑भि॒: स्वेभि॒रेवै॑र्म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥

यस्य॑ । अना॑प्तः । सूर्य॑स्यऽइव । यामः॑ । भरे॑ऽभरे । वृ॒त्र॒ऽहा । शुष्मः॑ । अस्ति॑ । वृष॑न्ऽतमः । सखि॑ऽभिः । स्वेभिः॑ । एवैः॑ । म॒रुत्वा॑न् । नः॒ । भ॒व॒तु॒ । इन्द्रः॑ । ऊ॒ती ॥

Mantra without Swara
यस्यानाप्त: सूर्यस्येव यामो भरेभरे वृत्रहा शुष्मो अस्ति। वृषन्तम: सखिभि: स्वेभिरेवैर्मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥

यस्य। अनाप्तः। सूर्यस्यऽइव। यामः। भरेऽभरे। वृत्रऽहा। शुष्मः। अस्ति। वृषन्ऽतमः। सखिऽभिः। स्वेभिः। एवैः। मरुत्वान्। नः। भवतु। इन्द्रः। ऊती ॥ १.१००.२

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 8 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
(यस्य) जिस परमेश्वर वा विद्वान् सभाध्यक्ष के (भरेभरे) धारण करने योग्य पदार्थ-पदार्थ वा युद्ध-युद्ध में (सूर्य्यस्येव) प्रत्यक्ष सूर्यलोक के समान (वृत्रहा) पापियों के यथायोग्य पाप-फल को देने से धर्म को छिपानेवालों का विनाश करता और (शुष्मः) जिसमें प्रशंसित बल हैं वह (यामः) मर्यादा का होना (अनाप्तः) मूर्ख और शत्रुओं ने नहीं पाया (अस्ति) है (सः) वह (वृषन्तमः) अत्यन्त सुख बढ़ानेवाला तथा (मरुत्वान्) प्रशंसित सेना जनयुक्त वा जिसकी सृष्टि में प्रशंसित पवन है वह (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् ईश्वर वा सभाध्यक्ष सज्जन (स्वेभिः) अपने सेवकों के (एवैः) पाये हुए प्रशंसित ज्ञानों और (सखिभिः) धर्म के अनुकूल आज्ञापालनेहारे मित्रों से उपासना और प्रशंसा को प्राप्त हुआ (नः) हम लोगों के (ऊती) रक्षा आदि व्यवहारों के सिद्ध करने के लिये (भवतु) हो ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेष और उपमालङ्कार हैं। मनुष्यों को यह जानना चाहिये कि यदि सूर्यलोक तथा आप्त विद्वान् के गुण, और स्वभावों का पार दुःख से जानने योग्य है तो परमेश्वर का तो क्या ही कहना है ! इन दोनों के आश्रय के विना किसी की पूर्ण रक्षा नहीं होती, इससे इनके साथ सदा मित्रता रखें ॥ २ ॥
Subject
अब ईश्वर और विद्वान् कैसे कर्मवाले हैं, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।