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Rigveda Mandal 1 / Sukta 100 / Mantra 18

191 Sukta
19 Mantra
1/100/18
Devata- इन्द्र: Rishi- वृषागिरो महाराजस्य पुत्रभूता वार्षागिरा ऋज्राश्वाम्बरीषसहदेवभयमानसुराधसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दस्यू॒ञ्छिम्यूँ॑श्च पुरुहू॒त एवै॑र्ह॒त्वा पृ॑थि॒व्यां शर्वा॒ नि ब॑र्हीत्। सन॒त्क्षेत्रं॒ सखि॑भिः श्वि॒त्न्येभि॒: सन॒त्सूर्यं॒ सन॑द॒पः सु॒वज्र॑: ॥

दस्यू॑न् । शिम्यू॑न् । च॒ । पु॒रु॒ऽहू॒तः । एवैः॑ । ह॒त्वा । पृ॒थि॒व्याम् । शर्वा॑ । नि । ब॒र्ही॒त् । सन॑त् । क्षेत्र॑म् । सखि॑ऽभिः । श्वि॒त्न्येभिः॑ । सन॑त् । सूर्य॑म् । सन॑त् । अ॒पः । सु॒ऽवज्रः॑ ॥

Mantra without Swara
दस्यूञ्छिम्यूँश्च पुरुहूत एवैर्हत्वा पृथिव्यां शर्वा नि बर्हीत्। सनत्क्षेत्रं सखिभिः श्वित्न्येभि: सनत्सूर्यं सनदपः सुवज्र: ॥

दस्यून्। शिम्यून्। च। पुरुऽहूतः। एवैः। हत्वा। पृथिव्याम्। शर्वा। नि। बर्हीत्। सनत्। क्षेत्रम्। सखिऽभिः। श्वित्न्येभिः। सनत्। सूर्यम्। सनत्। अपः। सुऽवज्रः ॥ १.१००.१८

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 11 Mantra » 3

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Meaning
(सुवज्रः) जिसका श्रेष्ठ अस्त्र और शस्त्रों का समूह और (पुरुहूतः) बहुतों ने सत्कार किया हो वह (शर्वा) समस्त दुःखों का विनाश करनेवाला सभा आदि का अधीश (श्वित्न्येभिः) श्वेत अर्थात् स्वच्छ तेजस्वी (सखिभिः) मित्रों के साथ और (एवैः) प्रशंसित ज्ञान वा कर्मों के साथ (दस्यून्) डाकुओं को (हत्वा) अच्छे प्रकार मार (शिम्यून्) शान्त धार्मिक सज्जनों (च) और भृत्य आदि को (सनत्) पाले, दुःखों को (नि, बर्हीत्) दूर करे, जो (पृथिव्याम्) अपने राज्य से युक्त भूमि में (क्षेत्रम्) अपने निवासस्थान (सूर्यम्) सूर्यलोक, प्राण (अपः) और जलों को (सनत्) सेवे, वह सबको (सनत्) सदा सेवने के योग्य होवे ॥ १८ ॥
Essence
जो सज्जनों से सहित सभापति अधर्मयुक्त व्यवहार को निवृत्त और धर्म्य व्यवहार का प्रचार करके विद्या की युक्ति से सिद्ध व्यवहार का सेवन कर प्रजाके दुःखों को नष्ट करे, वह सभा आदि का अध्यक्ष सबको मानने योग्य होवे, अन्य नहीं ॥ १८ ॥
Subject
फिर वह क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

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