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Rigveda Mandal 1 / Sukta 100 / Mantra 17

191 Sukta
19 Mantra
1/100/17
Devata- इन्द्र: Rishi- वृषागिरो महाराजस्य पुत्रभूता वार्षागिरा ऋज्राश्वाम्बरीषसहदेवभयमानसुराधसः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ए॒तत्त्यत्त॑ इन्द्र॒ वृष्ण॑ उ॒क्थं वा॑र्षागि॒रा अ॒भि गृ॑णन्ति॒ राध॑:। ऋ॒ज्राश्व॒: प्रष्टि॑भिरम्ब॒रीष॑: स॒हदे॑वो॒ भय॑मानः सु॒राधा॑: ॥

ए॒तत् । त्यत् । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । वृष्णे॑ । उ॒क्थम् । वा॒र्षा॒गि॒राः । अ॒भि । गृ॒ण॒न्ति॒ । राधः॑ । ऋ॒ज्रऽअश्वः॑ । प्रष्टि॑ऽभिः । अ॒म्ब॒रीषः॑ । स॒हऽदे॑वः । भय॑मानः । सु॒ऽराधाः॑ ॥

Mantra without Swara
एतत्त्यत्त इन्द्र वृष्ण उक्थं वार्षागिरा अभि गृणन्ति राध:। ऋज्राश्व: प्रष्टिभिरम्बरीष: सहदेवो भयमानः सुराधा: ॥

एतत्। त्यत्। ते। इन्द्र। वृष्णे। उक्थम्। वार्षागिराः। अभि। गृणन्ति। राधः। ऋज्रऽअश्वः। प्रष्टिऽभिः। अम्बरीषः। सहऽदेवः। भयमानः। सुऽराधाः ॥ १.१००.१७

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 11 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) परमविद्या ऐश्वर्य से युक्त सभाध्यक्ष ! जो (वार्षागिराः) उत्तम प्रशंसित विद्वान् की वाणियों से प्रशंसित पुरुष (एतत्) इस प्रत्यक्ष (ते) आपके (उक्थम्) प्रशंसा करने योग्य वचन वा काम को सब लोग (अभिगृणन्ति) आपके मुख पर कहते हैं वह और (त्वत्) अगला वा अनुमान करने योग्य आपका (राधः) धन (वृष्णे) शरीर और आत्मा की प्रसन्नता के लिये होता है तथा जो (अम्बरीषः) शब्दशास्त्र के जानने (सहदेवः) विद्वानों के साथ रहने (भयमानः) अधर्माचरण से डरकर उससे अलग वर्त्ताव वर्त्तने और दुष्टों को भय करनेवाले (सुराधाः) जो कि उत्तम-उत्तम धनों से युक्त (ऋज्राश्वः) जिनकी सीधी बड़ी-बड़ी राजनीति हैं और (प्रष्टिभिः) प्रश्नों से पूछे हुए समाधानों को देते हैं, वे हम लोगों को सेवने योग्य कैसे न हों ? ॥ १७ ॥
Essence
जब विद्वान् उत्तम प्रीति के साथ उपदेशों को करते हैं, तब अज्ञानी जन विश्वास को पा उन उपदेशों को सुन अच्छी विद्याओं को धारणकर धनाढ्य होके आनन्दित होते हैं ॥ १७ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।