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Rigveda Mandal 1 / Sukta 100 / Mantra 15

191 Sukta
19 Mantra
1/100/15
Devata- इन्द्र: Rishi- वृषागिरो महाराजस्य पुत्रभूता वार्षागिरा ऋज्राश्वाम्बरीषसहदेवभयमानसुराधसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
न यस्य॑ दे॒वा दे॒वता॒ न मर्ता॒ आप॑श्च॒न शव॑सो॒ अन्त॑मा॒पुः। स प्र॒रिक्वा॒ त्वक्ष॑सा॒ क्ष्मो दि॒वश्च॑ म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥

न । यस्य॑ । दे॒वाः । दे॒वता॑ । न । मर्ता॑ । आपः॑ । च॒न । शव॑सः । अन्त॑म् । आ॒पुः । सः । प्र॒ऽरिक्वा॑ । त्वक्ष॑सा । क्ष्मः । दि॒वः । च॒ । म॒रुत्वा॑न् । नः॒ । भ॒व॒तु॒ । इन्द्रः॑ । ऊ॒ती ॥

Mantra without Swara
न यस्य देवा देवता न मर्ता आपश्चन शवसो अन्तमापुः। स प्ररिक्वा त्वक्षसा क्ष्मो दिवश्च मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥

न। यस्य। देवाः। देवता। न। मर्ता। आपः। चन। शवसः। अन्तम्। आपुः। सः। प्रऽरिक्वा। त्वक्षसा। क्ष्मः। दिवः। च। मरुत्वान्। नः। भवतु। इन्द्रः। ऊती ॥ १.१००.१५

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 10 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
(यस्य) जिस परम ऐश्वर्यवान् जगदीश्वर के (शवसः) बल की (अन्तम्) अवधि को (देवता) दिव्य उत्तम जनों में (देवाः) विद्वान् लोग (न) नहीं (मर्त्ताः) साधारण मनुष्य (न) नहीं (चन) तथा (अपः) अन्तरिक्ष वा प्राण भी (आपुः) नहीं पाते, जो (त्वक्षसा) अपने बलरूप सामर्थ्य से (क्ष्मः) पृथिवी (दिवः) सूर्य्यलोक तथा (च) और लोकों को (प्ररिक्वा) रच के व्याप्त हो रहा है (सः) वह (मरुत्वान्) अपनी प्रजा को प्रशंसित करनेवाला (इन्द्रः) परम ऐश्वर्यवान् परमेश्वर (न) हम लोगों के (ऊती) रक्षा आदि व्यवहार के लिये निरन्तर उद्यत (भवतु) होवे ॥ १५ ॥
Essence
क्या अनन्त गुण, कर्म, स्वभाववाले उस परमेश्वर का पार कोई ले सकता है कि जो अपने सामर्थ्य से ही प्रकृतिरूप अतिसूक्ष्म सनातन कारण से सब पदार्थों को स्थूलरूप उत्पन्न कर उनकी पालना और प्रलय के समय सबका विनाश करता है, वह सबके उपासना करने के योग्य क्यों न होवे ? ॥ १५ ॥
Subject
अब इस समस्त प्रजा का करनेवाला ईश्वर कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।