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Rigveda Mandal 1 / Sukta 100 / Mantra 14

191 Sukta
19 Mantra
1/100/14
Devata- इन्द्र: Rishi- वृषागिरो महाराजस्य पुत्रभूता वार्षागिरा ऋज्राश्वाम्बरीषसहदेवभयमानसुराधसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यस्याज॑स्रं॒ शव॑सा॒ मान॑मु॒क्थं प॑रिभु॒जद्रोद॑सी वि॒श्वत॑: सीम्। स पा॑रिष॒त्क्रतु॑भिर्मन्दसा॒नो म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥

यस्य॑ । अज॑स्रम् । शव॑सा । मान॑म् । उ॒क्थम् । प॒रि॒ऽभु॒जत् । रोद॑सी॒ इति॑ । वि॒श्वतः॑ । सी॒म् । सः । पा॒रि॒ष॒त् । क्रतु॑ऽभिः । म॒न्द॒सा॒नः । म॒रुत्वा॑न् । नः॒ । भ॒व॒तु॒ । इन्द्रः॑ । ऊ॒ती ॥

Mantra without Swara
यस्याजस्रं शवसा मानमुक्थं परिभुजद्रोदसी विश्वत: सीम्। स पारिषत्क्रतुभिर्मन्दसानो मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥

यस्य। अजस्रम्। शवसा। मानम्। उक्थम्। परिऽभुजत्। रोदसी इति। विश्वतः। सीम्। सः। पारिषत्। क्रतुऽभिः। मन्दसानः। मरुत्वान्। नः। भवतु। इन्द्रः। ऊती ॥ १.१००.१४

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 10 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
(यस्य) जिस सभा आदि के अधीश के (शवसा) शारीरिक तथा आत्मिक बल से युक्त प्रजाजन (मानम्) सत्कार (उक्थम्) वेदविद्या तथा (सीम्) धर्म न्याय की मर्यादा को (विश्वतः) सब ओर से (अजस्रम्) निरन्तर पालन और जो (रोदसी) विद्या के प्रकाश और पृथिवी के राज्य को भी (परिभुजत्) अच्छे प्रकार पालन करे। जो (क्रतुभिः) उत्तम बुद्धिमानी के कामों के साथ (मन्दसानः) प्रशंसा आदि से परिपूर्ण हुआ सुखों से प्रजाओं को (पारिषत्) पालता है (सः) वह (मरुत्वान्) अपनी सेना में उत्तम वीरों का रखनेवाला (इन्द्रः) परमैश्वर्य्यवान् सभापति (नः) हम लोगों के (ऊती) रक्षा आदि व्यवहार को सिद्ध करनेवाला निरन्तर (भवतु) होवे ॥ १४ ॥
Essence
जो सत्पुरुषों का मान, दुष्टों का तिरस्कार, पूरी विद्या, धर्म की मर्यादा, पुरुषार्थ और आनन्द कर सके, वही सभाध्यक्षादि अधिकार के योग्य हो ॥ १४ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।