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Rigveda Mandal 1 / Sukta 100 / Mantra 13

191 Sukta
19 Mantra
1/100/13
Devata- इन्द्र: Rishi- वृषागिरो महाराजस्य पुत्रभूता वार्षागिरा ऋज्राश्वाम्बरीषसहदेवभयमानसुराधसः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
तस्य॒ वज्र॑: क्रन्दति॒ स्मत्स्व॒र्षा दि॒वो न त्वे॒षो र॒वथ॒: शिमी॑वान्। तं स॑चन्ते स॒नय॒स्तं धना॑नि म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥

तस्य॑ । वज्रः॑ । क्र॒न्द॒ति॒ । स्मत् । स्वः॒ऽसाः । दि॒वः । न । त्वे॒षः । र॒वथः॑ । शिमी॑ऽवान् । तम् । स॒च॒न्ते॒ । स॒नयः॑ । तम् । धना॑नि । म॒रुत्वा॑न् । नः॒ । भ॒व॒तु॒ । इन्द्रः॑ । ऊ॒ती ॥

Mantra without Swara
तस्य वज्र: क्रन्दति स्मत्स्वर्षा दिवो न त्वेषो रवथ: शिमीवान्। तं सचन्ते सनयस्तं धनानि मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥

तस्य। वज्रः। क्रन्दति। स्मत्। स्वःऽसाः। दिवः। न। त्वेषः। रवथः। शिमीऽवान्। तम्। सचन्ते। सनयः। तम्। धनानि। मरुत्वान्। नः। भवतु। इन्द्रः। ऊती ॥ १.१००.१३

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 10 Mantra » 3

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Meaning
जिस सभाद्यध्यक्ष का (स्मत्) काम के वर्त्ताव की अनुकूलता का (स्वर्षाः) सुख से सेवन और (रवथः) भारी कोलाहल शब्द करनेवाला (शिमीवान्) जिससे प्रशंसित काम होते हैं वह (वज्रः) शस्त्र और अस्त्रों का समूह (क्रन्दति) अच्छे जनों को बुलाता और दुष्टों को रुलाता है (तस्य) उसके (दिवः) सूर्य्य के (त्वेषः) उजेले के (न) समान गुण, कर्म और स्वभाव प्रकाशित होते हैं, जो ऐसा है (तम्) उसको (सनयः) उत्तम सेवा अर्थात् सज्जनों के किये हुए उत्साह (सचन्ते) सेवन करते और (तम्) उसको (धनानि) समस्त धन सेवन करते हैं, इस प्रकार (मरुत्वान्) जो सभाध्यक्ष अपनी सेना में उत्तम वीरों को रखनेवाला (इन्द्रः) परमैश्वर्य्यवान् तथा (नः) हम लोगों के (ऊती) रक्षादि व्यवहारों के लिये यत्न करता है, वह हम लोगों का राजा (भवतु) होवे ॥ १३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। सभासद्, भृत्य, सेना के पुरुष और प्रजाजनों को चाहिये कि ऐसे उत्तम कामों का सेवन करें कि जिनसे विद्या, न्याय, धर्म वा पुरुषार्थ बढ़े हुए सूर्य के समान प्रकाशित हों, क्योंकि ऐसे कामों के विना उत्तम सुखों के सेवन, धन और रक्षा हो नहीं सकती, इससे ऐसे काम सभाध्यक्ष आदि को करने योग्य हैं ॥ १३ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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