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Rigveda Mandal 1 / Sukta 100 / Mantra 11

191 Sukta
19 Mantra
1/100/11
Devata- इन्द्र: Rishi- वृषागिरो महाराजस्य पुत्रभूता वार्षागिरा ऋज्राश्वाम्बरीषसहदेवभयमानसुराधसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स जा॒मिभि॒र्यत्स॒मजा॑ति मी॒ळ्हेऽजा॑मिभिर्वा पुरुहू॒त एवै॑:। अ॒पां तो॒कस्य॒ तन॑यस्य जे॒षे म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥

सः । जा॒मिऽभिः॑ । यत् । स॒म्ऽअजा॑ति । मी॒ळ्हे । अजा॑मिऽभिः । वा॒ । पु॒रु॒ऽहू॒तः । एवैः॑ । अ॒पाम् । तो॒कस्य॑ । तन॑यस्य । जे॒षे । म॒रुत्वा॑न् । नः॒ । भ॒व॒तु॒ । इन्द्रः॑ । ऊ॒ती ॥

Mantra without Swara
स जामिभिर्यत्समजाति मीळ्हेऽजामिभिर्वा पुरुहूत एवै:। अपां तोकस्य तनयस्य जेषे मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥

सः। जामिऽभिः। यत्। सम्ऽअजाति। मीळ्हे। अजामिऽभिः। वा। पुरुऽहूतः। एवैः। अपाम्। तोकस्य। तनयस्य। जेषे। मरुत्वान्। नः। भवतु। इन्द्रः। ऊती ॥ १.१००.११

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 10 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
जो (अपाम्) प्राप्त हुए मित्र, शत्रु और उदासीनों वा (तोकस्य) बालकों के वा (तनयस्य) पौत्र आदि बीच वर्त्ताव रखता हुआ (यत्) जब (मीह्ळे) संग्रामों में (एवैः) प्राप्त हुए (जामिभिः) शत्रुजनों के सहित (अजामिभिः) बन्धुवर्गों से अन्य शत्रुओं के सहित (वा) अथवा उदासीन मनुष्यों के साथ विरोधभाव प्रकट करता हुआ (पुरुहूतः) बहुतों से प्रशंसा को प्राप्त वा युद्ध में बुलाया हुआ (मरुत्वान्) अपनी सेना में उत्तम वीरों को रखनेवाला (इन्द्रः) परमैश्वर्य्यवान् सेना आदि का अधीश (जेषे) उक्त अपने बन्धु भाइयों को उत्साह और उत्कर्ष देने वा शत्रुओं के जीत लेने का (समजाति) अच्छा ढङ्ग जानता है (सः) वह (नः) हम लोगों के (ऊती) रक्षा आदि व्यवहार के लिये समर्थ (भवतु) हो ॥ ११ ॥
Essence
इस राज्यव्यवहार में किसी गृहस्थ को छोड़ ब्रह्मचारी वनस्थ वा यति की प्रवृत्ति होने योग्य नहीं है, और न कोई अच्छे मित्र और बन्धुओं के विना युद्ध में शत्रुओं को परास्त कर सकता है, ऐसे धार्मिक विद्वानों के विना कोई सेना आदि का अधिपति होने योग्य नहीं है, यह जानना चाहिये ॥ ११ ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।