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Rigveda Mandal 1 / Sukta 100 / Mantra 10

191 Sukta
19 Mantra
1/100/10
Devata- इन्द्र: Rishi- वृषागिरो महाराजस्य पुत्रभूता वार्षागिरा ऋज्राश्वाम्बरीषसहदेवभयमानसुराधसः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स ग्रामे॑भि॒: सनि॑ता॒ स रथे॑भिर्वि॒दे विश्वा॑भिः कृ॒ष्टिभि॒र्न्व१॒॑द्य। स पौंस्ये॑भिरभि॒भूरश॑स्तीर्म॒रुत्वा॑न्नो भव॒त्विन्द्र॑ ऊ॒ती ॥

सः । ग्रामे॑भिः । सनि॑ता । सः । रथे॑भिः । वि॒दे । विश्वा॑भिः । कृ॒ष्टिऽभिः॑ । नु । अ॒द्य । सः । पौंस्ये॑भिः । अ॒भि॒ऽभूः । अश॑स्तीः । म॒रुत्वा॑न् । नः॒ । भ॒व॒तु॒ । इन्द्रः॑ । ऊ॒ती ॥

Mantra without Swara
स ग्रामेभि: सनिता स रथेभिर्विदे विश्वाभिः कृष्टिभिर्न्व१द्य। स पौंस्येभिरभिभूरशस्तीर्मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥

सः। ग्रामेभिः। सनिता। सः। रथेभिः। विदे। विश्वाभिः। कृष्टिऽभिः। नु। अद्य। सः। पौंस्येभिः। अभिऽभूः। अशस्तीः। मरुत्वान्। नः। भवतु। इन्द्रः। ऊती ॥ १.१००.१०

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 9 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (मरुत्वान्) अपनी सेना में उत्तम वीरों को राखनेहारा (इन्द्रः) परमैश्वर्य्यवान् सेना आदि का अधीश (ग्रामेभिः) ग्रामों में रहनेवाले प्रजाजनों के साथ (सनिता) अच्छे प्रकार अलग-अलग किये हुए धनों को भोगता है (सः) वह आनन्दित होता है। जो (विदे) युद्धविद्या तथा विजयों को जिससे जाने, उस क्रिया के लिये (रथेभिः) सेना के विमान आदि अङ्गों और (विश्वाभिः) समस्त (कृष्टिभिः) शिल्प कामों की अति कुशलताओं से प्रकाशमान हो (सः) वह और जो (अशस्तीः) शत्रुओं की बड़ाई करने योग्य क्रियाओं को जानकर उनका (अभिभूः) तिरस्कार करनेवाला है (सः) वह (पौंस्येभिः) उत्तम शरीर और आत्मा के बल के साथ वर्त्तमान (नु) शीघ्र (अद्य) आज (नः) हम लोगों के (ऊती) रक्षा आदि व्यवहारों के लिये (भवतु) होवे ॥ १० ॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि जो पुर, नगर और ग्रामों का अच्छे प्रकार रक्षा करनेवाला वा पूर्ण सेनाङ्गों की सामग्री सहित जिसने कलाकौशल तथा शस्त्र-अस्त्रों से युद्धक्रिया को जाना हो और परिपूर्ण विद्या तथा बल से पुष्ट शत्रुओं के पराजय से प्रजा की पालना करने में प्रसन्न होता है, वही सेना आदि का अधिपति करने योग्य है, अन्य नहीं ॥ १० ॥
Subject
फिर वह कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।