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Rigveda Mandal 1 / Sukta 10 / Mantra 9

191 Sukta
12 Mantra
1/10/9
Devata- इन्द्र: Rishi- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आश्रु॑त्कर्ण श्रु॒धी हवं॒ नूचि॑द्दधिष्व मे॒ गिरः॑। इन्द्र॒ स्तोम॑मि॒मं मम॑ कृ॒ष्वा यु॒जश्चि॒दन्त॑रम्॥

आश्रु॑त्ऽकर्ण । श्रु॒धि । हव॑म् । नू । चि॒त् । द॒धि॒ष्व॒ । मे॒ । गिरः॑ । इन्द्र॑ । स्तोम॑म् । इ॒मम् । मम॑ । कृ॒ष्व । यु॒जः । चि॒त् । अन्त॑रम् ॥

Mantra without Swara
आश्रुत्कर्ण श्रुधी हवं नूचिद्दधिष्व मे गिरः। इन्द्र स्तोममिमं मम कृष्वा युजश्चिदन्तरम्॥

आश्रुत्ऽकर्ण। श्रुधि। हवम्। नू। चित्। दधिष्व। मे। गिरः। इन्द्र। स्तोमम्। इमम्। मम। कृष्व। युजः। चित्। अन्तरम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 20 Mantra » 3

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Meaning
(आश्रुत्कर्ण) हे निरन्तर श्रवणशक्तिरूप कर्णवाले (इन्द्र) सर्वान्तर्यामि परमेश्वर ! (चित्) जैसे प्रीति बढ़ानेवाले मित्र अपनी (युजः) सत्यविद्या और उत्तम-उत्तम गुणों में युक्त होनेवाले मित्र की (गिरः) वाणियों को प्रीति के साथ सुनता है, वैसे ही आप (नु) शीघ्र ही (मे) मेरी (गिरः) स्तुति तथा (हवम्) ग्रहण करने योग्य सत्य वचनों को (श्रुधि) सुनिये। तथा (मम) अर्थात् मेरी (स्तोमम्) स्तुतियों के समूह को (अन्तरम्) अपने ज्ञान के बीच (दधिष्व) धारण करके (युजः) अर्थात् पूर्वोक्त कामों में उक्त प्रकार से युक्त हुए हम लोगों को (अन्तरम्) भीतर की शुद्धि को (कृष्व) कीजिये॥९॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को उचित है कि जो सर्वज्ञ जीवों के किये हुए वाणी के व्यवहारों का यथावत् श्रवण करनेहारा सर्वाधार अन्तर्यामी जीव और अन्तःकरण का यथावत् शुद्धि हेतु तथा सब का मित्र ईश्वर है, वही एक जानने वा प्रार्थना करने योग्य है॥९॥
Subject
फिर भी परमेश्वर का निरूपण अगले मन्त्र में किया है-

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