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Rigveda Mandal 1 / Sukta 10 / Mantra 8

191 Sukta
12 Mantra
1/10/8
Devata- इन्द्र: Rishi- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
न॒हि त्वा॒ रोद॑सी उ॒भे ऋ॑घा॒यमा॑ण॒मिन्व॑तः। जेषः॒ स्व॑र्वतीर॒पः सं गा अ॒स्मभ्यं॑ धूनुहि॥

न॒हि । त्वा॒ । रोद॑सी॒ इति॑ । उ॒भे इति॑ । ऋ॒घा॒यमा॑णम् । इन्व॑तः । जेषः॑ । स्वः॑ऽवतीः । अ॒पः । सम् । गाः । अ॒स्मभ्य॑म् । धू॒नु॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
नहि त्वा रोदसी उभे ऋघायमाणमिन्वतः। जेषः स्वर्वतीरपः सं गा अस्मभ्यं धूनुहि॥

नहि। त्वा। रोदसी इति। उभे इति। ऋघायमाणम्। इन्वतः। जेषः। स्वःऽवतीः। अपः। सम्। गाः। अस्मभ्यम्। धूनुहि॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 20 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे परमेश्वर ! ये (उभे) दोनों (रोदसी) सूर्य्य और पृथिवी जिस (ऋघायमाणम्) पूजा करने योग्य आपको (नहि) नहीं (इन्वतः) व्याप्त हो सकते, सो आप हम लोगों के लिये (स्वर्वतीः) जिनसे हमको अत्यन्त सुख मिले, ऐसे (अपः) कर्मों को (जेषः) विजयपूर्वक प्राप्त करने के लिये हमारे (गाः) इन्द्रियों को (संधूनुहि) अच्छी प्रकार पूर्वोक्त कार्य्यों में संयुक्त कीजिये॥८॥
Essence
जब कोई पूछे कि ईश्वर कितना बड़ा है, तो उत्तर यह है कि जिसको सब आकाश आदि बड़े-बड़े पदार्थ भी घेर में नहीं ला सकते, क्योंकि वह अनन्त है। इससे सब मनुष्यों को उचित है कि उसी परमात्मा का सेवन उत्तम-उत्तम कर्म करने और श्रेष्ठ पदार्थों की प्राप्ति के लिये उसी की प्रार्थना करते रहें। जब जिसके गुण और कर्मों की गणना कोई नहीं कर सकता, तो कोई उसके अन्त पाने को समर्थ कैसे हो सकता है?॥८॥
Subject
फिर अगले मन्त्र में ईश्वर का प्रकाश किया है-