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Rigveda Mandal 1 / Sukta 10 / Mantra 4

191 Sukta
12 Mantra
1/10/4
Devata- इन्द्र: Rishi- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः Chhanda- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
एहि॒ स्तोमाँ॑ अ॒भिस्व॑रा॒भि गृ॑णी॒ह्या रु॑व। ब्रह्म॑ च नो वसो॒ सचेन्द्र॑ य॒ज्ञं च॑ वर्धय॥

आ । इ॒हि॒ । स्तोमा॑न् । अ॒भि । स्व॒र॒ । अ॒भि । गृ॒णी॒हि॒ । आ । रु॒व॒ । ब्रह्म॑ । च॒ । नः॒ । व॒सो॒ इति॑ । सचा॑ । इन्द्र॑ । य॒ज्ञम् । च॒ । व॒र्ध॒य॒ ॥

Mantra without Swara
एहि स्तोमाँ अभिस्वराभि गृणीह्या रुव। ब्रह्म च नो वसो सचेन्द्र यज्ञं च वर्धय॥

आ। इहि। स्तोमान्। अभि। स्वर। अभि। गृणीहि। आ। रुव। ब्रह्म। च। नः। वसो इति। सचा। इन्द्र। यज्ञम्। च। वर्धय॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 19 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) स्तुति करने के योग्य परमेश्वर ! जैसे कोई सब विद्याओं से परिपूर्ण विद्वान् (स्तोमान्) आपकी स्तुतियों के अर्थों को (अभिस्वर) यथावत् स्वीकार करता कराता वा गाता है, वैसे ही (नः) हम लोगों को प्राप्त कीजिये। तथा हे (वसो) सब प्राणियों को वसाने वा उनमें वसनेवाले ! कृपा से इस प्रकार प्राप्त होके (नः) हम लोगों के (स्तोमान्) वेदस्तुति के अर्थों को (सचा) विज्ञान और उत्तम कर्मों का संयोग कराके (अभिस्वर) अच्छी प्रकार उपदेश कीजिये (ब्रह्म च) और वेदार्थ को (अभिगृणीहि) प्रकाशित कीजिये। (यज्ञं च) हमारे लिये होम ज्ञान और शिल्पविद्यारूप क्रियाओं को (वर्धय) नित्य बढ़ाइये॥४॥
Essence
इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। जो पुरुष वेदविद्या वा सत्य के संयोग से परमेश्वर की स्तुति प्रार्थना और उपासना करते हैं, उनके हृदय में ईश्वर अन्तर्यामि रूप से वेदमन्त्रों के अर्थों को यथावत् प्रकाश करके निरन्तर उनके लिये सुख का प्रकाश करता है, इससे उन पुरुषों में विद्या और पुरुषार्थ कभी नष्ट नहीं होते॥४॥
Subject
मनुष्यों को परमेश्वर से क्या-क्या माँगना चाहिये, सो अगले मन्त्र में प्रकाश किया है-