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Rigveda Mandal 1 / Sukta 10 / Mantra 3

191 Sukta
12 Mantra
1/10/3
Devata- इन्द्र: Rishi- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः Chhanda- विराड्नुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यु॒क्ष्वा हि के॒शिना॒ हरी॒ वृष॑णा कक्ष्य॒प्रा। अथा॑ न इन्द्र सोमपा गि॒रामुप॑श्रुतिं चर॥

यु॒क्ष्व । हि । के॒शिना॑ । हरी॒ इति॑ । वृष॑णा । क॒क्ष्य॒ऽप्रा । अथ॑ । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । सो॒म॒ऽपाः॒ । गि॒राम् । उप॑ऽश्रुतिम् । च॒र॒ ॥

Mantra without Swara
युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा। अथा न इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिं चर॥

युक्ष्व। हि। केशिना। हरी इति। वृषणा। कक्ष्यऽप्रा। अथ। नः। इन्द्र। सोमऽपाः। गिराम्। उपऽश्रुतिम्। चर॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 19 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सोमपाः) उत्तम पदार्थों के रक्षक (इन्द्र) सब में व्याप्त होनेवाले ईश्वर ! जैसे आपका रचा हुआ सूर्य्यलोक जो अपने (केशिना) प्रकाशयुक्त बल और आकर्षण अर्थात् पदार्थों के खीचने का सामर्थ्य जो कि (वृषणा) वर्षा के हेतु और (कक्ष्यप्रा) अपनी-अपनी कक्षाओं में उत्पन्न हुए पदार्थों को पूरण करने अथवा (हरी) हरण और व्याप्ति स्वभाववाले घोड़ों के समान और आकर्षण गुण हैं, उनको अपने-अपने कार्यों में जोड़ता है, वैसे ही आप (नः) हम लोगों को भी सब विद्या के प्रकाश के लिये उन विद्याओं में (युक्ष्व) युक्त कीजिये। (अथ) इसके अनन्तर आपकी स्तुति में प्रवृत्त जो (नः) हमारी (गिराम्) वाणी हैं, उनका (उपश्रुतिम्) श्रवण (चर) स्वीकार वा प्राप्त कीजिये॥३॥
Essence
इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। सब मनुष्यों को सब विद्या पढ़ने के पीछे उत्तम क्रियाओं की कुशलता में प्रवृत्त होना चाहिये। जैसे सूर्य्य का उत्तम प्रकाश संसार में वर्त्तमान है, वैसे ही ईश्वर के गुण और विद्या के प्रकाश का सब में उपयोग करना चाहिये॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में इन्द्र शब्द से ईश्वर और सूर्य्यलोक का प्रकाश किया है-