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Rigveda Mandal 1 / Sukta 10 / Mantra 2

191 Sukta
12 Mantra
1/10/2
Devata- इन्द्र: Rishi- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः Chhanda- विराड्नुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यत्सानोः॒ सानु॒मारु॑ह॒द्भूर्यस्प॑ष्ट॒ कर्त्व॑म्। तदिन्द्रो॒ अर्थं॑ चेतति यू॒थेन॑ वृ॒ष्णिरे॑जति॥

यत् । सानोः॑ । सानु॑म् । आ । अरु॑हत् । भूरि॑ । अस्प॑ष्ट । कर्त्व॑म् । तत् । इन्द्रः॑ । अर्थ॑म् । चे॒त॒ति॒ । यू॒थेन॑ । वृ॒ष्णिः । ए॒ज॒ति॒ ॥

Mantra without Swara
यत्सानोः सानुमारुहद्भूर्यस्पष्ट कर्त्वम्। तदिन्द्रो अर्थं चेतति यूथेन वृष्णिरेजति॥

यत्। सानोः। सानुम्। आ। अरुहत्। भूरि। अस्पष्ट। कर्त्वम्। तत्। इन्द्रः। अर्थम्। चेतति। यूथेन। वृष्णिः। एजति॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 19 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जैसे (यूथेन) वायुगण अथवा सुख के साधन हेतु पदार्थों के साथ (वृष्णिः) वर्षा करनेवाला सूर्य्य अपने किरणसमूह से प्रकाश करके (सानोः) पर्वत के एक शिखर से (सानुम्) दूसरे शिखर को (भूरि) बहुधा (आरुहत्) प्राप्त होता (अस्पष्ट) स्पर्श करता (एजति) क्रम से अपनी कक्षा में घूमता और घुमाता है, वैसे ही जो मनुष्य क्रम से एक कर्म को सिद्ध करके दूसरे को (कर्त्त्वम्) करने को (भूरि) बहुधा (आरुहत्) आरम्भ तथा (अस्पष्ट) स्पर्श करता हुआ (एजति) प्राप्त होता है, उस पुरुष के लिये (इन्द्रः) सर्वज्ञ ईश्वर उन कर्मों के करने को (सानोः) अनुक्रम से (अर्थम्) प्रयोजन के विभाग के साथ (भूरि) अच्छी प्रकार (चेतति) प्रकाश करता है॥२॥
Essence
इस मन्त्र में भी इव शब्द की अनुवृत्ति से उपमालङ्कार समझना चाहिये। जैसे सूर्य्य अपने सम्मुख के पदार्थों को वायु के साथ वारंवार क्रम से अच्छी प्रकार आक्रमण, आकर्षण और प्रकाश करके सब पृथिव्यादि लोकों को घुमाता है, वैसे ही जो मनुष्य विद्या से करने योग्य अनेक कर्मों को सिद्ध करने के लिये प्रवृत्त होता है, वही अनेक क्रियाओं से सब कार्य्यों के करने को समर्थ हो सकता तथा ईश्वर की सृष्टि में अनेक सुखों को प्राप्त होता, और उसी मनुष्य को ईश्वर भी अपनी कृपादृष्टि से देखता है, आलसी को नहीं॥२॥
Subject
फिर भी ईश्वर को कैसे जानें, सो अगले मन्त्र में प्रकाश किया है-