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Rigveda Mandal 1 / Sukta 10 / Mantra 11

191 Sukta
12 Mantra
1/10/11
Devata- इन्द्र: Rishi- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ तू न॑ इन्द्र कौशिक मन्दसा॒नः सु॒तं पि॑ब। नव्य॒मायुः॒ प्र सू ति॑र कृ॒धी स॑हस्र॒सामृषि॑म्॥

आ । तु । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । कौ॒शि॒क॒ । म॒न्द॒सा॒नः । सु॒तम् । पि॒ब॒ । नव्य॑म् । आयुः॑ । प्र । सु । ति॒र॒ । कृ॒धि । स॒ह॒स्र॒ऽसाम् । ऋषि॑म् ॥

Mantra without Swara
आ तू न इन्द्र कौशिक मन्दसानः सुतं पिब। नव्यमायुः प्र सू तिर कृधी सहस्रसामृषिम्॥

आ। तु। नः। इन्द्र। कौशिक। मन्दसानः। सुतम्। पिब। नव्यम्। आयुः। प्र। सु। तिर। कृधि। सहस्रऽसाम्। ऋषिम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 20 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (कौशिक) सब विद्याओं के उपदेशक और उनके अर्थों के निरन्तर प्रकाश करनेवाले (इन्द्र) सर्वानन्दस्वरूप परमेश्वर ! (मन्दसानः) आप उत्तम-उत्तम स्तुतियों को प्राप्त हुए और सब को यथायोग्य जानते हुए (नः) हम लोगों के (सुतम्) यत्न से उत्पन्न किये हुए सोमादि रस वा प्रिय शब्दों से की हुई स्तुतियों का (आ) अच्छी प्रकार (पिब) पान कराइये (तु) और कृपा करके हमारे लिये (नव्यम्) नवीन (आयुः) अर्थात् निरन्तर जीवन को (प्रसूतिर) दीजिये, तथा (नः) हम लोगों में (सहस्रसाम्) अनेक विद्याओं के प्रकट करनेवाले (ऋषिम्) वेदवक्ता पुरुष को भी (कृधि) कीजिये॥११॥
Essence
जो मनुष्य अपने प्रेम से विद्या का उपदेश करनेवाला होकर अर्थात् जीवों के लिये सब विद्याओं का प्रकाश सर्वदा शुद्ध परमेश्वर की स्तुति के साथ आश्रय करते हैं, वे सुख और विद्यायुक्त पूर्ण आयु तथा ऋषि भाव को प्राप्त होकर सब विद्या चाहनेवाले मनुष्यों को प्रेम के साथ उत्तम-उत्तम विद्या से विद्वान् करते हैं॥११॥
Subject
फिर परमेश्वर कैसा और मनुष्यों के लिये क्या करता है, इस विषय को अगले मन्त्र में प्रकाश किया है-