Adhyay 8

Manusmriti

Shloka 55 Chapter Eight

Adhyay 8
Shloka 55

Chapter Eight

Subject: राजधर्मान्तर्गत व्यवहार - निर्णय

420 Shloka
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Adhyay 8 Shloka 55
Shloka
असंभाष्ये साक्षिभिश्च देशे संभाषते मिथः। निरुच्यमानं प्रश्नं च नेच्छेद्यश्चापि निष्पतेत्॥

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1 Bhashyas
Meaning
(यः) जो ऋणदाता १. (अदेश्यं दिशति) झूठे गवाह और गलत प्रमाणपत्र प्रस्तुत करे, (च) और २. (य:) जो (निर्दिश्य) किसी बात को प्रस्तुत करके या कहकर (अपह्न ते) उससे मुकरता है या टालमटोल करता है, ३. (यः) जो (विगीतान् अधर - उत्तरान् + अर्थान् न+ध्रुवबुध्यते) कही हुई अगली पिछली बातों को नहीं ध्यान में रखता अर्थात् जिसकी अगली-पिछली बातों में मेल न हो, ४. (यः) जो (अपदेश्यम् अपदिश्य पुनः अपधावति) अपने तर्कों को प्रस्तुत करके फिर उनको बदल दे– उनसे फिरजाये, ५. जो (सम्यक् प्रणिहितम् अ पृष्ठ: सन्) पहले अच्छी प्रकार प्रतिज्ञापूर्वक कही हुई बात को न्यायाधीश द्वारा पुनः पूछने पर (न + अभिनन्दति) नहीं मानता, ६. (असंभाष्ये देशे साक्षिभिः मिथ: संभाषते) जो एकान्त स्थान में जाकर साक्षियों के साथ घुलमिलकर चुपचुप बात करे, ७. (निरुच्यमानं प्रश्नं न + इच्छेत्) जांच के लिए पूछे गये प्रश्नों को जो पसंद न करे, ८. (च यः + अपि निष्पतेत्) और जो इधर-इधर टलता फिरे (च) तथा ६. ('ब्रू हि' इति + उक्त: न ब्रूयात्) 'कहो' ऐसा कहने पर कुछ न कहे १०. (च उक्तं न विभावयेत्) और जो कही हुई बात को प्रमाणित न कर पाये, ११. (न पूर्वापरं विद्यात्) पूर्वापर बात को न समझे अर्थात् विचलित हो जाये, (सः तस्मात् अर्थात् हीयते) वह उस प्रार्थना किये गये धन से हार जाता है अर्थात् न्यायाधीश ऐसे व्यक्ति को हारा हुआ मानकर उसे धन न दिलावे॥५३–५६ ।।