Adhyay 8

Manusmriti

Shloka 4 Chapter Eight

Adhyay 8
Shloka 4

Chapter Eight

Subject: राजधर्मान्तर्गत व्यवहार - निर्णय

420 Shloka
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Adhyay 8 Shloka 4
Shloka
तेषां आद्यं ऋणादानं निक्षेपोऽस्वामिविक्रयः। संभूय च समुत्थानं दत्तस्यानपकर्म च॥

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Meaning
अठारह मार्ग ये हैं—(तेषाम्) उनमें १- (ऋणादानम्) किसी से ऋण लेने-देने का विवाद, २ - (निक्षेपः) धरोहर अर्थात् किसी ने किसी के पास पदार्थ - धरा हो और मांगे पर न देना, ३ - (अस्वामिविक्रयः) दूसरे के पदार्थ को दूसरा बेच लेवे, ४~ (संभूय च समुत्थानम्) मिल-मिलाके किसी पर अत्याचार करना, ५ – (दत्तस्य अनपकर्म च) दिये हुए पदार्थ का न देना, ६ – (वेतनस्य +एव च + प्रदानम्) वेतन अर्थात् किसी की 'नौकरी' में से ले लेना या कम देना, ७– (संविदः च व्यतिक्रमः) प्रतिज्ञा से विरुद्ध वर्तना, ८ - (क्रय-विक्रय + अनुशय:) क्रय-विक्रयानुशय अर्थात् लेन-देन में झगड़ा होना, 8 - (स्वामि-पालयोः विवादः) पशु के स्वामी और पालने वाले का झगड़ा, १० – (सीमाविवादधर्म: च) सीमा का विवाद, ११-१२ (पारुष्ये दण्ड-वाचिके) किसी को कठोर दण्ड देना, कठोरवाणी का बोलना, १३ – (स्तेयम्) चोरी-डाका मारना, १४ – (साहसम् एव) किसी काम को बलात्कार से करना, १५ – (स्त्रीसंग्रहणम् एव च) किसी की स्त्री वा पुरुष का व्यभिचार होना, १६ – (स्त्री-पुम् + धर्म:) स्त्री और पुरुष के धर्म में व्यतिक्रम होना, १७ - (विभाग:) विभाग अर्थात् दायभाग में वाद उठाना, १८ – (द्यूतम् + य एव च) द्यूत अर्थात् जड़पदार्थ और [ आह्वय] = समाह्वय अर्थात् चेतन को दाव में घर के जुआ खेलना, (अष्टादश + एतानि) ये अठारह प्रकार के (व्यवहारस्थितौ पदानि) परस्परविरुद्ध व्यवहार के स्थान हैं॥४–७॥(स० प्र० षष्ठ समु०)