Adhyay 8

Manusmriti

Shloka 345 Chapter Eight

Adhyay 8
Shloka 345

Chapter Eight

Subject: राजधर्मान्तर्गत व्यवहार - निर्णय

420 Shloka
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Adhyay 8 Shloka 345
Shloka
वाग्दुष्टात्तस्कराच्चैव दण्डेनैव च हिंसतः। साहसस्य नरः कर्ता विज्ञेयः पापकृत्तमः॥

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1 Bhashyas
Subject
(अक्षयम् +अव्ययम्) न नष्ट होने वाले तथा न कम होने वाले
Meaning
साहसिक पुरुष का लक्षण- (वाक्-दुष्टात्) जो दुष्ट वचन बोलने (तस्करात्) चोरी करने (दण्डेन एव हिंसतः) बिना अपराध से दण्ड देने वाले से भी (साहसस्य कर्त्ता नरः) साहस, वलात्कार काम करने वाला है (पापकृत्तम: विज्ञेयः) वह अतीव पापी, दुष्ट है॥३४५॥(स० प्र० षष्ठ समु०)