Adhyay 8

Manusmriti

Shloka 337 Chapter Eight

Adhyay 8
Shloka 337

Chapter Eight

Subject: राजधर्मान्तर्गत व्यवहार - निर्णय

420 Shloka
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Adhyay 8 Shloka 337
Shloka
अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्। षोडशैव तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत्क्षत्रियस्य च॥

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Meaning
वैसे ही (तत् दोषगुरगवित् हि सः) जो कुछ विवेकी होकर (स्तेये) चोरी करे (शूद्रस्य तु अष्टापाद्यम) उस शूद्र को चोरी से ग्राठ गुणा (वैश्यस्य तु षोडश एव) वैश्य को सोलह गुरगा (क्षत्रियस्य द्वात्रिंशत्) क्षत्रिय को बत्तीस गुरगा (ब्राह्मणस्य चतुः षष्टिः) ब्राह्मरण को चौंसठ गुरगा (अपि वा शतम्) वा सौ गुणा (वा) अथवा (द्विगुरगा चतुःषष्टिः) एक सौ अट्ठाईसगुरणा (किल्विषं भवति) दण्ड होना चाहिए अर्थात् जिसका जितना ज्ञान और जितनी प्रतिष्ठा अधिक हो, उसको अपराध में उतना ही अधिक दण्ड होना चाहिए ॥३३७-३३८॥