Adhyay 8

Manusmriti

Shloka 25 Chapter Eight

Adhyay 8
Shloka 25

Chapter Eight

Subject: राजधर्मान्तर्गत व्यवहार - निर्णय

420 Shloka
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Adhyay 8 Shloka 25
Shloka
बाह्यैर्विभावयेल्लिङ्गैर्भावं अन्तर्गतं नृणाम्। स्वरवर्णेङ्गिताकारैश्चक्षुषा चेष्टितेन च॥

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1 Bhashyas
Meaning
न्यायकर्ता को (वाह्य :) बाहर के (लिङ्ग :) चिह्नों से [वेशभूषा, चाल, शरीर की मुद्राएं, आदि के लक्षणों से ] (स्वर-वर्ण-इङ्गित-प्रकार:) स्वरबोलते समय रुकना, घबराना, गद्गद् होना आदि से वर्ण – चेहरे का फीका पड़ना, लज्जित होना आदि से इङ्गित - मुकद्दमे के अभियुक्तों के परस्पर के संकेत, सामने न देख सकना, इधर-उधर देखना आदि से आकार-मुख-नेत्र आदि का आकार बनाना, काँपना, पसीना आना आदि से (चक्षुषा) आंखों में उत्पन्न होने चाले भावों से (च) और (चेष्टितेन) चेष्टाओं-हाथ मसलना, अंगुलियां चटकाना, गूठे से जमीन कुरेदना, सिर खुजलाना आदि से (नृणाम्) मुकद्दमे में शामिल लोगों के (अन्तर्गतं भावम्) मन के असली भावों को (विभावयेत्) भांप लेनाजान लेना चाहिये ॥२५॥